• azam_dehlvi 12w

    यह दहर हुस्न ही हुस्न की नुमाइश है,
    मेरे ज़ब्त की इलाही क्या ख़ूब आज़माइश है...

    जो बात मेरी जान पे ग़रान ग़ुज़री है,
    वो बात जानने की उनकी ख़्वाहिश है...

    बहुत दूर निकल आएं हैं हम अपनी तलाश मे,
    अब लौट आने की न कोई गुजाइश है...

    अपने होंठ मेरे होंठ पे रख के वो कहते हैं,
    अब और भी कुछ पाने की क्या तुम्हे ख़्वाहिश है...

    आज की रात हो 'आज़म' के कयामत की रात,
    या ख़ुदा मेरी तुझसे इतनी सी ग़ुज़ारिश है...

    ©azam_dehlvi