• parle_g 16w

    वज़्न 2122 2122 2122 212

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    मुक्तक !

    लाज़मी है, कोई पत्थर इस जवानी में रखे
    तुम कहो तो दाग़, हम ये आग पानी में रखे
    मुझसे अपने गम का मातम अब नही होता जिया
    कित'ने दिन इक़ आयना, कोई निशा'नी में रखे

    फिर मुहब्बत की तलाफ़ी, ख़्वाब से मर जायगा
    आज लग'ता है ज'फ़र अस्बाब से मर जायगा
    गालिबन उस शख्स का क़ा'तिल, यहीं है शहर में
    कौन जा'हिल है, जो फिर जहराब से मर जायगा
    ©parle_g