• ishq_allahabadi 16w

    तमन्ना

    आ मेरी तमन्ना के बिखरते चमन को देख,
    तू मेरा सब्र देख मेरे ख़स्ता तन को देख ।

    लिपटी हुई ग़मों के समन्दर में सिसकियाँ,
    बोसीदा इस बदन पे मिरे पैरहन को देख।

    मक़रूज़ रही तुझ पे मुहब्बत ऐ ज़िन्दगी,
    मदफ़ून मुहब्बत पे उढ़े इस कफ़न को देख।

    कातिब की किताबें हैं मिरे ज़िक्र से ख़ाली,
    मेरी ज़वाल-ए-ज़ात में उस दिल शिकन को देख।

    ख़ून-ए-दिल-ए-ग़रीब पे हँसता है ज़माना,
    मक़तूल-ए-दिल पे शाद ये अहल-ए-ज़मन को देख।

    रातें हैं सर्द गर्म हरारत है गिर्द क्यों,
    मेरे बदन को छोड़ मिरी रूह-ए-तन को देख।

    मेरे हर इक सवाल से क्यों है ज़बान तंग,
    मेरे सवाल-ए-हक़ से तू अपनी चुभन को देख।
    ©ishq_allahabadi