• rahat_samrat 17w

    छंद- मनोरम
    वर्ण- 8,
    मात्रा- 14
    चरण- 4 (दो-दो समतुकांत)
    विधान- रगण तगण + SS
    SIS SSI SS

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    छंद
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    वेदना में बाध्य होते,
    मौन पंछी हास्य खोते।
    ज्यो सुधा विस्तार खोती,
    रिक्तता में हार होती।

    शून्य वैरागी हमारा,
    सौम्य मिथ्या सूक्ष्म धारा।
    क्या पिपासा रक्त की है,
    या छली आसक्त की है।

    मृत्यु तेरा शोर कैसा,
    है निशा भी भोर कैसा।
    आत्मता का ज्ञान भारी,
    मिथ्य मैँ उत्थान हारी।

    कल्पना उत्थान की थी,
    विस्मृतों में भान की थी।
    क्यों मिली आशा प्रभारी,
    ज्ञान तृष्णा छद्म धारी।

    सुप्त शंका विद्वता में,
    पोखरों की आद्रता में।
    तृप्त आभा कौन होगी,
    भिन्नता क्या मौन होगी?
    ©rahat_samrat