• dipps_ 28w

    ग़ज़ल

    जात मजहब में यूं रिश्ता निभाते हुए,
    बिछड़ गए थे दो लोग पास आते हुए!

    क्या कमी थी मुस्कुराते चेहरे में देखो,
    खुश नहीं लगते खुशियां सजाते हुए!

    चल पड़ें थे दो आशिक़ चाँद को छूने,
    इन बादलों पर इक रास्ता बनाते हुए!

    कैसे उनकी याद से रुखसत हो जाते,
    मुझे गले लगाया था उन्होंने जाते हुए!

    मतले से हर शे'र फ़िर उलझता गया,
    इक मुकम्मल ग़ज़ल को बनाते हुए!
    ©dipps_