• 7saptarangi_lekhan 19w

    आज की रात बहुत काली थी
    सूरज ने चाँदनी पाली थी

    समझ रहे थे जिसे कहकशाँ
    वो तो महज़ एक थाली थी

    महकती रहीं जो आठ - पहर
    वो बाहें फू'लों की डाली थी

    मोहब्बत मिली बचपन मिला
    कल मैं ने यादें खंगाली थी

    दोस्ती महँगी पड़ी मुझ को
    दुशमनी भी मेरी ज़ाली थी

    समझ रहे थे तारीफ़ के पुल
    दरअसल मिरे लिए गाली थी

    कोई चाँद समझता कोई सूरज
    वो तो तेरे कान की बाली थी

    हमारे शेर में आसमां लाल था
    या फिर तिरे लबों की लाली थी

    'सप्तरंग' तस्वीर मिलगई आज
    जो आपने कब से संभाली थी

    ©7saptarangi_lekhan