• dil_k_ahsaas 6w

    " उधार "

    तितलियों से कुछ उनके हसीन मनमोहक रँग उधार माँगे हैं
    अपने मुरझाए चेहरे को मैं अब खिला-खिला देखना चाहती हूँ।

    तन्हाइयों की खनक से भरी हँसी गूँजती है चारों ओर मेरे
    अब मैं जंजीरों को तोड़ खिलखिला कर हँसना चाहती हूँ।

    इक तेरी चाहत में बेवजह ही फना कर दिया खुद को
    अब खुद को समेट कर फिर से जिंदा कर जीना चाहती हूँ।

    दूर कहीं आसमान मोहब्बत से धरती के गले मिलता दिखता है
    मैं धरती और तुम को अपना आसमां बनते देखना चाहती हूँ।

    बेबस दरिया बहता रहता है दो किनारों के बीच बँध कर
    मैं हर किनारे को तोड़कर उन्मुक्त हो कर बहना चाहती हूँ।

    दरख्तों की मजबूरी है कि एक दिन सूखा शज़र बन मरना है
    मैं सूखे पड़े शज़र को मोहब्बत से सींच हरा-भरा करना चाहती हूँ।

    रेत थी कि हाथों से फिसलती ही रही और मुठ्ठी में पकड़ी ना गई
    रेत की इस कला को सीख मैं हर बेड़ी को तोड़ निकलना चाहती हूँ।

    दिल में एक शोर मचा है एहसासों और हकीकत के नज़ारों का
    दिल की दीवारें फौलादी कर कर्कश आवाज़ छीन लेना चाहती हूँ।

    दिल के एहसास। रेखा खन्ना