• happy81 17w

    दंगा..
    ज़रूरी नहीं दंगा बाहर हो..
    अनुपस्थित प्रेम.. परिवार में सुषुप्त दंगा ला देता है..
    ज़रूरी नहीं दंगा कोहलाहम मचाये..
    दंगा जब भीतर मन को काटे तो मौन भी बन जाता है..
    एकता को जुटाते है सभ्य लोग...
    निरक्षरता प्रतीक दंगे का बन जाता है..
    जाता नहीं सिर्फ औदा..
    जाति धर्म भी बिगड़ जाता है..
    सदभाव वंचित जहाँ वहाँ दंगा बन जाता है..
    पैदा होती है वर्जित मानसिकताएं..
    माहौल दूषित हो जाता है..
    देश जब कालाबाजारी.. और निठल्लो पर आ जाता है..
    भारती चीखती है विलाप करती है..
    जब कोई खून.. अच्छा गिर जाता है..
    दंगा सिर्फ हमें नहीं सबको खा जाता है..
    प्रेम अनुपस्थित जहाँ.. वहाँ दंगा बन जाता है.. !!..
    दंगे के होते कई रूप..

    ©happy81