• tortoise 23w

    झूठा फ़साना

    एक भारीपन सा है, सीने में कहीं। कुछ अटका हुआ सा मेरी ज़ुबां पर। क्या मैं वाकई डरती हूं कमिटमेंट से? हां, ये तो सच है, कि कोई वीडियो यदि ४ मिनट से बड़ी है, तो मुझे सोचना पड़ता है। और ज़्यादातर मैं बिना देखे ही उसकी तारीफ़ भी कर देती हूं। अक्सर पकड़ी भी जाती हूं, स्वाभाविक है। शायद। पर वीडियो देखना समय की बर्बादी जैसा प्रतीत होता है, इसीलिए, हैना?

    मेरे ज़्यादा दोस्त नहीं हैं। मुझे दूर से ही दोस्ती रखना आता है। यूं करीब जा कर उनकी ज़िंदगी में दख़ल करने को मैं ज़रूरी नहीं समझती। किसी दोस्त से मिलने के लिए २ घंटे ट्रैवल करना, या जब चाहा तब घूमने निकल जाना, ये वायदे नहीं किए जा सकते। मेरे अपने दायरे हैं, शायद घरवालों के भी हों। पता नहीं। इतना समय गुज़ार लिया है एक माहौल में कि पता नहीं चलता, क्या मेरा अपना है, क्या समाज का दिया हुआ।

    तुम प्रेम करते हो मुझसे। यकीन मानो खुश हूं मैं ये जान कर। मैं भी यकीनन उतना ही प्रेम करती हूं तुमसे, या शायद थोड़ा ज़्यादा। प्रेम में प्रेमी अपना सब कुछ न्योछावर कर देते हैं, एक दूजे पर। बिना जाने कि सामने वाला धोखा देगा, या नहीं। पर मैं तुम्हें कसमें नहीं दे सकती, साथ जीने मरने की। ना ही वायदा कर सकती हूं, हमेशा तुम्हें और तुम्हारे प्रेम को समझने का। मुझे नहीं करनी ज़िद्द तुमसे, तुम्हारा वक्त मांगने के लिए। ना ही ये गारंटी दे सकती हूं कि मेरी पूरी दुनिया तुम ही रहोगे। क्योंकि मैंने इन वायदों को टूटते देखा है। मैं वापस से नहीं टूटना चाहती, भले ही तुम कितने भी सच्चे हो, मैं कभी तुम्हें अपने आप को पूरा नहीं दे पाऊंगी। क्योंकि, कभी वो तुम ही तो थे ना जो मुझे छोड़ के चले गए थे बीच राह पर, ये कह कर कि मैं बहुत ज़्यादा हूं!

    (ये अधूरा फ़साना है...
    अभी हमें एक और हिस्सा लेके आना है!)

    ©tortoise