• pragyat_01 68w

    कुछ हैरान हूं परेशान हूं,
    नियति के आगे लाचार खड़ा,
    बेबस इंसान हूँ।।
    हां मैं इंसान हूँ,
    क़भी फुटपाथ पर ठोकर खाता गिरता उठता,
    रोता फिर सम्भल जाता,
    हाँ मैं इंसान हूँ,
    दो जून की रोटी को दर दर भटकता,
    जूठे बर्तन धोता इंसानों की बस्ती में,
    भूख से बिलखते पेट से आवाज़ आती
    हाँ मैं इंसान हूँ,
    क़भी मंदिर का प्रसाद चखता,क़भी लंगर
    की पंक्ति में खड़ा हो दोपहर का भोजन
    जुटाता,इंसानों की भीड़ में,
    सूनसान चुपचाप अकेला खड़ा,
    हां मैं इंसान हूँ,
    तपती दुपहरी हो,या पांव में छाले हों,
    जीवन है बड़ा दुर्गम,अनवरत चलना होगा,
    ऐसा देखा मैंने।
    नौनिहालों को भीख मांगते देखा,
    सड़कों से स्कूल जाते देखा,
    हाँ मैंने जीवन में फर्क देखा,
    कूड़े के बोझ तले,
    सपनों को दबते देखा
    मैंने,
    बचपन को जीवन खोजते देखा,
    चल मन,कोसों दूर लोभ,लालच,मक्कारी,
    और ईर्ष्या की अग्नि से,
    जहां प्यार हो,इक़रार हो,सम्मान हो,
    संवेदना हो,कोई तो शेष होगी ऐसी बस्ती,
    कवि की कल्पना में,
    जहां सिर्फ इंसान हो।।

    ~प्रज्ञात

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    मैं इंसान हूँ।

    अनुशीर्षक में....