• nikhilkhandare 29w

    अब तो मज़हब कोई ऐसा भी चलाया जाए
    जिस में इंसान को इंसान बनाया जाए

    जिस की ख़ुश्बू से महक जाए पड़ोसी का भी घर
    फूल इस क़िस्म का हर सम्त खिलाया जाए

    आग बहती है यहाँ गंगा में झेलम में भी
    कोई बतलाए कहाँ जा के नहाया जाए

    प्यार का ख़ून हुआ क्यूँ ये समझने के लिए
    हर अँधेरे को उजाले में बुलाया जाए

    मेरे दुख-दर्द का तुझ पर हो असर कुछ ऐसा
    मैं रहूँ भूका तो तुझ से भी न खाया जाए

    जिस्म दो हो के भी दिल एक हों अपने ऐसे
    मेरा आँसू तेरी पलकों से उठाया जाए

    गीत अनमन है ग़ज़ल चुप है रुबाई है दुखी
    ऐसे माहौल में 'नीरज' को बुलाया जाए

    - गोपालदास नीरज