• shayar_tera 38w

    एक उम्मीद की किरण थोड़ी जागी थीं,
    कि गाँव से शहरों की तरफ दुनिया फिर भागी थी।

    वक़्त का पहलू ज़रा झुका ही था हक में,
    ना जाने फिर कैसे ये सितम दुनिया में छाई थी।

    कितनों के अपने बिछड़ गए इस पल में,
    ना जाने कैसे डर कर लोगों ने अबतक वक़्त घरों में गुजारी थी।

    अब हर शख्स बस एक ही दुआ करता दिखता हैं,
    जोड़ें हुए पैसे ले लो सारी पर सुकून की ज़िंदगी लौटा दो हमारी।




    ©shayar_tera