• jigna_a 7w

    मैं विशेष

    आपाधापी, भागादौड़ी,
    विचार ज़्यादा, करनी थोड़ी,
    यंत्रमानव बन रह गई थी,
    मेरी यह ज़िंदगी।

    उठो, भागो, काम करो,
    पैसे कमाओ, खर्च कर दो,
    फिर घोड़े बेच आराम करो,
    कुछ व्यर्थ नहीं था,
    परंतु अर्थ भी नहीं।

    जब कुछ घड़ी थम के बैठी,
    व्यस्तता भले थी ऐंठी,
    जब ध्यान में पलकें मूँदी थी,
    मैंने खुद की छवि ढूँढी थी।

    मैंने दूजों के मन को जाना,
    सबका, सबकुछ अपना माना,
    उन स्पंदनों को शब्दों में ढाला,
    सब पूछे, मैंने उनके मन को कैसे जाना?

    उस पल लगा मैं खास हूँ,
    मेरे शब्दों में ढलकर मिला मुझे,
    स्वयं का खुदपे विश्वास हूँ,
    अब अलग सी मेरी हस्ती है,
    मेरी हँसी, मेरे लेखन में बसती है।
    ©jigna_a