• archanatiwari_tanuja 120w

    प्रकृति और हम

    उन्मूलित कर कट रहे जंगल बस रही बस्तियां,
    मिटाने को आमादा खुद ही खुद की हस्तियां।

    हमने बहुत किया खिलवाड़ प्रकृति .........से,
    कितने ही मासूम जानवरों का लहूँ बहाया है।

    जगह-जगह पर कचरों का ढ़ेर लगाया .....है,
    नदी नालों मे कैमिकल का जहर मिलाया है।

    वायु मण्डल मे फैला धुआं ही धुआं ........है,
    मोटरगाड़ियों, कारखानों का शोर मचाया है।

    जंगलों को काट निर्जन हमनें ही बनाया ..है,
    पशु-पक्षियों को भी बेघर हमने ही बनाया है।

    कर रही कब से धरती हमारी दया की गुहार,
    फिर भी नादान तू! उस पे तरस ना खाया है।

    प्रकृति ले रही है जब हिसाब...........तुझसे,
    मानव फिर क्यों तू अब तिलमिलाया... है??

    कहीं पे सूखा कहीं पे उठा बाढ़ का सैलाब है,
    तो जहां-तहां भूकंप का खतरा छाया......है।

    प्रकृति का अब जरा देखो तुम........ इंसाफ,
    कहीं पर आग की लपटों ने जलाया ........है।

    इंसानों को सबक सिखाने की .........खातिर,
    कोरोना का महादानव हर देश पे मडराया है।

    अब तो करो प्रायश्चित अपनी भूल ........का,
    सुरक्षा के नियम पालन का वक़्त आया.. है।

    खुद सुरक्षित रहो औरो को भी ....समझाओ,
    कोरोना का दानव ज़िदगी निगलने आया है।

    अर्चना तिवारी(तनुजा)
    ©archanatiwari_tanuja