• suryamprachands 17w

    मेरी ये कविता, मेरे कविकुल के अग्रज "बाबा तुलसीदास" के विश्व विख्यात महाकाव्य "श्रीराम चरितमानस के उस खंड से हैं जहाँ, श्री राम को वनवास भेंट करने के उपरांत "माँ कैकेयी" और "पूज्य भरत" के मध्य संवाद होता है। मैंने कल्पनात्मक दृष्टिकोण अपनाकर वो कहने का प्रयास किया है जो एक स्नेही माँ अपने पुत्र के लिए और एक रुष्ट पुत्र अपने माँ से कह सकता हो। दो खंडों में विभक्त इस कविता के प्रथम खंड में पूज्य भरत, माँ कैकेयी से और द्वितीय खंड में माँ कैकेयी पूज्य भरत से प्रश्न पूछती हैं ��

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    संवाद-2

    भरत-
    हे माता तूने कैसे ऐसा पाप कर दिया?
    रघुकुल को मिला अमर वर, तूने श्राप कर दिया?
    मर्यादा मूरत राम की, तुझको मोह ना आई?
    श्रीमान तात को तूने,अपनी सौंह दिलाई?
    अब ये समाज जाने मुझपे क्या मृषा गढ़ेगा?
    या मम मस्तक निज भ्रातृ-द्रोह का पाप मढ़ेगा?
    किस-किस को अपनी सच्चाई बतलाऊँगा मैं?
    मैं मर जाऊँ या सीना फाड़ दिखाऊँगा मैं?
    इस पाप ने अपनी सीमा लाँघा तो क्या होगा?
    निज तनय अवधपुर ने माँगा फ़िर तो क्या होगा?
    क्या इस सृष्टि में होगा कोई मुझ सा भ्राता?
    या आगे हो पायेगी कोई तुझ सी माता?
    जन्म दिया था मुझको वो अभिशाप कर दिया?
    हे माता तूने कैसे ऐसा पाप कर दिया?

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    माँ कैकेयी-
    रे भरत! मातृ का प्रेम नही, तू भ्रातृ चुनेगा?
    बहुत सुनाया मुझको, अब एक बात सुनेगा?
    क्या मैंने बोला था राजा से, वचन मुझे दें?
    या माँग लिया हो कि, वो धरती गगन मुझे दें?
    कौन ना चाहे, सुत उसका सम्राट बने?
    जय हो, उसका जीवन विविध विराट बने?
    यदि मैंने ऐसा चाहा, तो फ़िर गलत कर दिया?
    रघुकुल की उज्ज्वल आभा में, है कलुष भर दिया?
    रे भरत! तुझे यह कहते किंचित लाज़ ना आई?
    माँ के निर्णय से बड़ा, कर दिया तूने भाई?
    प्रियता और अप्रियता का ऐसा सूत्र क्या होगा?
    माँ भाई हो ना हो पर ऐसा पुत्र क्या होगा?
    कह दिया कुमाता तूने क्या कर दिया है ऐसा?
    मैं माँगू तुझ सा पुत्र या कि उस राघव जैसा?

    ©Suryam Prachands