• prashant_gazal 19w

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    ग़ज़ल (इश्क़)

    इस तरह ज़िंदगी का गुज़ारा हुआ l
    इश्क़ हर रोज़ उनसे दुबारा हुआ l

    हर अना हो गई है फ़ना ख़ुद-ब-ख़ुद ,
    इश्क़ से इश्क़ ऐसा हमारा हुआ l

    होश होता तो कहते जवाँ कब हुए ?
    कब निग़ाहें मिलीं, कब इशारा हुआ ?

    हुस्न उनका अगर एक सफ़ में कहूँ,
    चाँद है आसमाँ से उतारा हुआ l

    ख़ुश-ख़ुमारी हमारी, हमारी नहीं,
    है सुरूर-ए-मुहब्बत निखारा हुआ l

    आशिक़ों बात तुम भी यही फिर कहो,
    दिल हमारा 'ग़ज़ल' , लो तुम्हारा हुआ l
    ©prashant_gazal