• jigna_a 41w

    संयोग/संजोग

    दो बूँदें रक्त की रोकी थी,
    द्रौपदी ने वस्त्र को फाड़कर,
    दो मुट्ठी तांबूल खिलाए थे,
    सुदामा ने पोटली से छानकर,
    कुब्जा की आँखें तरसी थी,
    आपका स्पर्श पारस मानकर,
    अर्जुन हिम्मत ना हारा था,
    आपका संगाथ पा कर,
    भीष्म ने साँसें ना छोड़ी थी,
    बिन आपसे वार्तालाप कर,
    संजय ने पलकें ना झपकी थी,
    विश्वरूप निहारकर,
    राधा प्रतिक्षण जलती थी,
    आपके विरह को प्रसाद जानकर,
    मीरा गरल तक पी गई,
    किया स्वयं को आप पे न्योछावर,

    मेरे कृष्ण,
    हर योग में संयोग आप,
    हर संयोग का आयोग आप,
    अहंकार में वियोग आप,
    समर्पण में प्रयोग आप,
    अपितु जीवन सार गीता का,
    हर अध्याय का विनियोग आप।

    ©jigna_a