• secondchild 61w

    मन का कौतुहल

    कुछ लिखूँ या दिन गिनते रह जाऊँ,
    आज फिर साँस पूछे मुझसे कि-
    "तुझको आऊँ तो क्यों आऊँ?"

    छटपटाहट में सुलगती रेत पर चल रहा हूँ,
    मैं शहर में हूँ,फिर भी हर वक़्त पिघल रहा हूँ।

    कौतुहल भीतर भी है और बाहर भी,
    अगर जीवन ही जीत है तो हर दिन कई हार भी।
    उन हार से ज़िन्दगी न हारे ये भी अलग लड़ाई है,
    तुमको क्या लगा ! सबने सिर्फ कोरोना से जान गवाई है ।

    मंज़ूर तो किसी को नहीं पर तय है-कि ये ज़ख्म सबको सहना है,
    आज खुशियों का मतलब सिर्फ ज़िंदा रहना है।

    तालों में बंद महफ़ूज़ हैं, पर कब तक?


    आज पिंजरों का रुतबा बढ़ गया।
    बंदिशों का भक्षक भी अब उन्ही बंदिशों का अर्थ समझ गया ।
    पर ज़िद्द पर क़ाबू और भी बेताब कर देता है,
    भला चार दीवारों में अपने यौवन को कौन सज़ा देता है।

    कभी कभी होंसला कहता है कि-
    "घुटन को पी कर,कर यक़ीन,
    कि ये आशियाँ तेरा खूबसूरत है,
    जो कभी चुभती थी आंखों में आज
    तुझे उसी रोशनी की ज़रूरत है ।"


    पर ज़िंदगी की तरह ये होंसला भी क्षण भंगुर है।

    कब शोर सिसकियों में दब गया खुद ही यह समझ कर कि कल फिर आंसुओं की ज़रूरत पड़ेगी,
    और कल आंसुओं को रोक दिया किसी ने ये बोलकर कि- " संभाल खुद को,वरना अगली चिता तुम्हारी जलेगी।"

    सब मकड़जाल में फसे हैं, अपनी बारी के इंतज़ार में ,अपनो से पहले बस इसी दरकार में,
    क्यूंकि हमने कभी खुद के लिए जीना सीखा ही नहीं।
    अपनों के बिना दुनिया कैसी होगी,ये सोचा ही नहीं।
    और यही सच है।

    "कुछ कम ही सही ये ज़िन्दगी अब तक लड़ी तो,
    कभी अपने लिए,कभी अपनो के लिए।"

    पर क्या यही अंत है?
    ©secondchild