• aparna_shambhawi 51w

    अपनी धुरी पर घूमती पृथ्वी
    लगाती है परिक्रमा सूरज के
    बिना परस्पर स्पर्श के पहुँचा आता है सूरज
    अपना प्रेम धरती तक अपनी ऊष्मा से,

    अपने आसन पर विराजित सूर्य
    बैठा देखता है पृथ्वी को आँगन में नाचती अल्हड़ स्त्री मानकर,
    और अपने सुख-दुःख से अकुलाई धरती
    कराती है अनुभव सूरज को जीवित होने का।

    हे सूर्य मेरे!

    मेरी कविता तुम्हारी धरती है,
    और मैं शशि,
    तुम्हें अपनी पृथ्वी का जीवन-दायक मान,
    प्रणाम करती हूँ!

    ~ अपर्णा शाम्भवी