• krati_sangeet_mandloi 137w

    अफ़साना

    कैसा है ये अफ़साना,
    जिसमें ना गूंजे कोई तराना।

    अपनों के अपनेपन से दूर,
    बोझ जिम्मेदारियों का लिए,
    तय नहीं है जिसका कोई पैमाना,
    कैसा है ये अफ़साना...जिसमें ना गूंजे कोई तराना।

    तन्हाई को समेटती मुश्किलों में
    घुटन और सिसकियों से नाता जोड़,
    क्या यही है ज़िंदगी में कमाना?
    कैसा है ये अफ़साना...जिसमें ना गूंजे कोई तराना।

    दर्द में राहत अपनों से,
    मुश्किल में हिम्मत अपनों से,
    क्यों उनसे फिर अपने दिल का हाल छुपाना?
    कैसा है ये अफ़साना...जिसमें ना गूंजे कोई तराना।

    दूरियों का सफर तो कायम है,
    दफ़न कर अपने नाजुक एहसासों को,
    नहीं मिलेगा सुकून का कोई खजाना,
    कैसा है ये अफ़साना...जिसमें ना गूंजे कोई तराना।

    ख़याल थमने का नाम नहीं लेते,
    ग़मगीन कर देते ये माहौल को,
    अकेलेपन में इनसे कैसा रिश्ता निभाना?
    कैसा है ये अफ़साना...जिसमें ना गूंजे कोई तराना।

    खुशनसीबी से मिलता है साया अपनों का,
    बढ़ती है तकलीफ़े कुछ कहने से उन्हें,
    इस वहम को जरा तुम मिटाना,
    कैसा है ये अफ़साना...जिसमें ना गूंजे कोई तराना।

    ज़िंदगी का नग़मा होगा खूबसूरत,
    रोशन होगी हर राह सफ़र की,
    सभी के संग इसे गुनगुनाना,
    कैसा है ये अफ़साना...जिसमें ना गूंजे कोई तराना।

    ©Krati_Mandloi✍️
    (3-06-2019)