• dil_k_ahsaas 6w

    " आफताब और अँधेरा "


    वो आफताब बन कर जिंदगी में आया
    मेरी अपनी रौशनी को भी चुरा कर
    मेरे अंदर, दिल की गहराइयों तक
    मरघट का अँधेरा भर कर
    एक दिन चुपचाप चला गया।

    अपनी ही रौशनी को तलाशती रही मैं
    ना वो वापस आया ना मेरी अपनी
    रौशनी ही मुझे कभी वापिस मिल सकी
    पर हाँ जिँदा हूँ अब तक अँधेरों को
    अपने अंदर समेटे हुए शायद किसी उम्मीद में।

    रोज़ थोड़ा-थोड़ा करके मरघट का
    अँधेरा निगल रहा है अब
    अक्सर सोचती हूँ कि आफताब तो
    रौशनी भरता है किसी की जिंदगी में
    पर ये कैसा आफताब था जो
    सिर्फ अँधेरों को अपनी चमक के पीछे
    बड़ी ही कुशलता से छिपा कर लाया था।

    वो चँचल और अपने में ही खुश रहने वाली
    लड़की ना जाने मेरे अंदर से निकल कर
    कहाँ खो गई कभी पता ही ना चल सका
    बस अब आँखों को बेवजह ही तंग करती हूँ
    कि अंँधेरों में झाँक कर खुद को ढूँढ लाए
    कहीं से भी और कैसे भी, बस ढूँढ लाए।

    रोज़ खुद को यूं ही थोड़ा-थोड़ा सा मरता हुआ
    देखना बहुत दुख देता है पर जिँदा रहने की भी
    तो अब कोई ख्वाहिश ना बची है दिल में
    पर जी रहीं हूँ जैसे तैसे, हाँ अब बेवजह
    मुस्कराहट आ ही जाती है जब कोई हाल पूछ लेता है
    अब हर किसी को तो दुखड़ा नहीं सुनाया जाता है।

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    अक्सर सोचती हूँ कि मुस्कराहटों की भी उम्र होती है क्या
    आँखों की चमक की भी उम्र होती है क्या
    की एक दिन अचानक जैसे शरीर की मौत होती है
    इनकी भी मौत हो जाती हैं और फिर कितना भी चाह लो
    ये जिँदा हो कर फिर चहकती और चमकती ही नहीं है।

    कभी कभी ऐसा भी लगता है जैसे कुछ लोग
    एक श्राप के तरह जिंदगी में शामिल होते हैं और
    एक कोढ़ बन कर ताउम्र के लिए जिंदगी में ठहर जाते हैं
    और धीरे-धीरे कर के अँगो की भाँति
    जब तक सब-कुछ ना निगल लें, पीछा छोड़ते ही नहीं है
    और इनसे पीछा छुड़ाने के लिए सिर्फ मौत ही
    एकमात्र उपाय है, पर क्या कोढ़ का कोई इलाज नहीं है।

    आफताब, माहताब, मोहब्बत, प्यार,
    विश्वास सब कुछ झूठ है
    सब कुछ झूठ का एक ऐसा पुलिंदा है जिसे
    हर इंसान शायद बेबस है ढोने के लिए
    गर कोई आवताब बन‌ जिँदगी में आता है तो फिर
    वो अँधेरा बन कर कैसे छा जाता है चारों ओर
    और जो पहले से ही अँधेरों में जी रहा है
    कोई कैसे उसकी जिंदगी को रौशनी से भर जाता है।

    अनगिनत सवाल और उनके अनगिनत जवाब सोचते-सोचते
    जिंदगी बीत रही है पर दिल को तसल्ली देने वाला
    जवाब कभी भी ना मिला, मिला तो हर बार एक नया सवाल
    पुराने हो गए जवाब में से टुकुर-टुकुर झांँकता हुआ
    ऐसे जैसे कह रहा हो मैं तो पीछे ही रह गया अनदेखा हो कर
    मेरा जवाब भी तो ढूँढों ना, पर क्या हर सवाल का जवाब मौजूद है, तो क्या आफताब और अपनी खो गई रौशनी को ढूँढने के साथ साथ अब मन मार कर जवाबों के पीछे भी भागना पड़ेगा।

    अनगिनत एहसास, अनगिनत ख्याल एक दूसरे पर हावी होकर अक्सर मुझे उलझा देते हैं और मैं इनके सख्त
    तानों-बानों में उलझ कुछ समय के लिए रौशनी को तलाशना भूल कर अंँधेरोँ में रहना पसंद करने लगती हूँ।
    मैं दिया और ये मेरी कहानी। नाम है दिया पर वो दिया जिसकी अपनी रौशनी ना जाने कब की खो गई है। वो दिया, जो ना जाने कब अँधरों की भेंट चढ़ा दी गई।

    दिल के एहसास। रेखा खन्ना
    ©dil_k_ahsaas