• mamtapoet 19w

    युवा

    फूलों पर बहका हूँ कभी
    तो गुलाब बन चमन में महका भी मैं हूँ।

    चांदनी रातों में जगा हूँ
    तो जुगनू बन अंधेरो में जला भी मैं हूँ।

    किताबों में डूबा रहा हूँ कभी ,
    तो बन्जर खेतों में सोना बन उगा भी मैं हूँ।

    उन्मुक्त परिंदे सा स्वछंद उड़ा हूँ ,
    बुरे रीति रिवाजों से लड़ा भी मै हूँ।

    भटका हूँ राह से कभी, तो
    पथ के शूल चुने है औरों के , वो भी मैं हूँ।

    रक्त बहाया तब बात और थी,
    जननी, जन्म भूमि के लिए खून से नहाया भी मैं हूँ।

    न थका हूँ न झुका हूँ, न रुका हूँ,
    अनवरत जो उबाल बन बह रहा,
    हर नस में वो लहू भी मैं हूँ।

    धरती से भी चाँद का पहरा रखता हूँ,
    जमी को भेदने की, आसमां को छेदने की,
    उम्मीद में हर दम करता हूँ।
    जिद पे आ चुका हूँ, दुनिया को बदलने की ताकत भी मैं युवा अब रखता हूँ।
    ©mamtapoet