prakharsinghofficial

www.singhdigital.in

स्वतंत्रत कवि

Grid View
List View
Reposts
  • prakharsinghofficial 65w

    "रात काली है"

    मैंने कश्ती को किनारे से टकराते देखा है
    आजकल रात को रात से घबराते देखा है।
    ©prakharsinghofficial

  • prakharsinghofficial 65w

    "काल की करवट"

    लाशों का ढेर लगा है गंगा तट पर
    घंटों का अंबार सजा है पिपल वट पर
    तांडव कर रहा है काल देख विक्रराल
    मूक दर्शक बन जनता पूछे किससे सवाल?
    कितनी मांगे सुनी हुई है
    कितनो ने पुत्र विछोह देखा
    कहीं बुझा चिराग कुल का
    कहीं चिता को नसीब नही आग हुआ
    सब कहते है ये वक़्त भी गुज़र जाएगा
    जो चला गया इस दुनिया से क्या वह वापस आएगा?
    घर मे रहने की सीख देख देता है हर कोई
    पूछो उनसे भूखे पेट कहाँ कोई सो पायेगा!
    हो सक्षम तो किसी अपने की मदद करना
    परिस्थिति विषम है इसलिए संकोच मत करना।
    ©prakharsinghofficial

  • prakharsinghofficial 198w

    अब और तब की दीवली

    जब हम छोटे बच्चे थे,तब दीवाली क्या होती थी,
    अब दीवाली क्या होती है,,
    उस वक़्त बड़ा उत्साह था होता,
    इस वक्त निराशा होती है,,
    उस पल हम ख़ुद को खो लेतें थे,
    इस पल ख़ुद को ढूंढ रहें हैं,,
    उस वक्त समय था मुट्ठी में,
    इस पल हम हैं समय की मुट्ठी में,,
    उस वक़्त अनूठे खेल थे खेलें,
    इस वक़्त जिंदगी खेल रही है,,
    उस दौर शोर शराबा रहता था,
    इस वक़्त ख़ामोशी रहती है,,
    उस पल खुशियाँ बिखरीं थी,
    इस पल खुशियाँ ढूंढ रहें हैं,,
    वो दौर दीवाली का याद आता है,जिस दौर दीवाली होती थी
    अब नाम दीवाली का होता है,नाममात्र दीवाली होती है।
    ©prakharsinghofficial

  • prakharsinghofficial 200w

    फ़रिश्ते

    शहर बदला,इमाम बदले,बदलनें लगे हैं रिश्तें
    इस अजनबी से शहर में मिलते हैं,हररोज़ फरिश्ते

  • prakharsinghofficial 202w

    माँ की दुआएं

    आँधियों की तेज में भी,दुवाओं का वह दीप जलता रहा,
    लगता है उसे खुद मेरी माँ ने सँजो रखा है,,।

  • prakharsinghofficial 203w

    भारतीय रेल

    यात्रीगण कृपया ध्यान दें की आवाज,स्टेशन परिसर में गूँज रही है
    भारतीय रेल अपने मुसाफ़िरों को ढूंढ रही है
    कहीं रेलवे की खिड़कियाँ टूटी है,कहीं डिब्बों में छेद है
    यह भारतीय रेल है साहब,असुविधा के लिए खेद है
    आरक्षित अनारक्षित का यहाँ भी खेल है
    कहीं रेल डीरेल है,तो कहीं पटरियाँ बेमेल है
    भारतीय रेल सच मे बड़ा महान है
    अमीर ग़रीब का फ़र्क नहीं यहाँ,सब एक समान है
    सफ़र की श्रेड़ियाँ,प्रथम,द्वितीय,तृतीय,सयनयान,सामान्य है
    सबको साथ लेकर चलना ही भारतीय रेल की पहचान है
    स्टेशन परिसर में रेलगाड़ी के आने का इंतजार था
    हर पांच मिनटों में यात्रियों को आगाह भी किया जाता था
    यह रेल फलां स्थान से चलकर फलां स्थान जाने वाली है
    प्लेटफार्म संख्या चार पर फलां रेल आने वाली है
    सब एक टक फलां रेलगाड़ी को निहार रहे थे
    मुसाफ़िर अपना स्थान सुनिश्चित करने की जद्दोजहद कर रहे थे
    जैसे ही रेल रेलवे स्टेशन के क़रीब पहुँच कर रुकी
    आधी से ज्यादा भीड़,चालू डब्बे की ओर झुकी
    हाल ये क़िस्सा मैं ख़ुद के सफ़र का बयां करता हूँ
    आजकल मैं चालू में सफ़र किया करता हूँ
    बड़े जद्दोजहद के बाद मुझे भी अंदर जाने का मौका मिला
    हरेक को सफ़र करनी थी,मुझे जिंदगी अनूठा अनुभव मिला
    समान्य डिब्बा असामान्य हो चुका था
    मैं ख़ुद की तलाश में खुद को खो चुका था
    जिसे मैं तक़लीफ़ समझ रहा था,वह जिंदगी का हिस्सा है
    भारतीय रेल में सफ़र कर रहे मुसाफ़िर का यही किस्सा है
    शौचालय के द्वार पर भी जगह नहीं होती बैठने की
    चालू में मजाल नहीं होती किसी की शौच करने की
    सबकी अटकलें अगले स्टेशन पर रुकी है
    दरवाजे के पास ही,सारी भीड़ सी झुकी है
    बड़े धक्कामुक्की का सफ़र था,पर जीवन का सच भी यही है
    भारतीय रेल में सफ़र ये मुसाफ़िर का सच भी यही है।

    प्रखर सिंह की कलम से..

  • prakharsinghofficial 207w

    सिर्फ प्यार

    ना तुम मेरी कमज़ोरी बनो,और ना मैं तुम्हारी जरूरत बनूँ
    चलो प्यार करते हैं,सौदा नहीं।

  • prakharsinghofficial 207w

    याद

    तन्हा हूँ,अकेला हूँ,जिद है उनसे दूर जाने की
    बहुत कोशिश करता हूँ,मैं उन्हें भूल जाने की
    बेशक़ मुझे प्यार था उनसे,पर एकतरफा नहीं,
    कमबख्त ये दिल है कि,उन्हें भूलता ही नहीं,.
    ©prakharsinghofficial

  • prakharsinghofficial 207w

    ख़्वाब

    कहाँ था मैं,कहाँ ले आये
    जमीन पर था मैं,ख़्वाब में ले आये ।
    ©prakharsinghofficial

  • prakharsinghofficial 207w

    आंगन की गौरैया

    वो आखिरी गौरैया भी उड़ चली मेरी आंगन से,
    जिसको सम्हाल रखा था,मैंने माँ की आँचल से,,
    उसकी फुदकन से गुलज़ार होते थे मेरे घर आंगन,
    हर सुबह उसकी चहचाहट मोह लेती थी सबका मन,,
    हर सुबह वह गौरैया निकल पड़ती थी अन्न की तलाश में,
    नन्हे नन्हे बच्चे चु चु करते रहते अपने घरोंदे में,,
    एक सुबह ऐसी थी उन मासूमों के लिए जिसकी शाम ना आयी,
    माँ गयी थी अन्न की तलाश में,पर वह वापस ना आ पायी,,
    मुझे लगा वह छोड़ हमको उड़ चली किसी और ठोर,
    पर मैं विचलित तब हुआ,जब देखा उसके शव को,,
    मुह में अन्न दबाकर वह गिरी थी जमीं पर इस क़दर,
    मानो कह रही हो कि कोई,मेरे भूखे नवनिहालों का पेट भर दे इस पहर,,
    अब देर हो चुकी यह था,मैं जानता,
    इसे सच कहता या झूठ मैं मानता,,
    उन मासूमों की परवरिश में अब ग्रहण लग गया,
    जो कल के सपने संजोये थे,उनका स्वप्न आज ही बिखर गया,,
    साँसे थम गयी उस पल,अल्फ़ाज़ बह गये भावनाओं में,
    वो आखिरी गौरैया की आखिरी फुदकन थी मेरे आंगन में,,
    उस गौरैया की जिंदगी का वह आखिरी सवेरा था,
    उस दिन उसके शव को उसकी बिरादरी ने घेरा था,,
    उन नन्हे नन्हे मासूमों के जीवन मे,अब अंधेरा ही अंधेरा था,
    उस गौरैया का मेरे आंगन में वह आखिरी डेरा था,,
    लिया शव मैं हाथ में,उस गौरैया का,चला करने अन्तिमसंस्कार,
    साथ में मेरे चला,उसका मासूम परिवार,
    अश्रु भरे नयनों से सिर्फ माँ की ही राह थे निहारते,,
    माँ तो उड़ चली, पर यह नौनिहाल नही थे जानते,
    कुछ दिन बाद वह नन्ही चहचहाहट भी रुक गयी,,
    आख़िरी याद,वो आखिरी गौरैया भी कहीं भटक गयी।

    ©प्रखर सिंह की क़लम से