prashant_gazal

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  • prashant_gazal 4d

    कानून

    पिता से कौन सा बेटा वसीयत माँगता है ?
    बहन के साथ कब कोई वकालत माँगता है ?
    नये कानून बनते हैं, बिगड़ते हैं मगर क्या,
    कभी कोई लहू की भी ख़िलाफत माँगता है ?

    कई कानून हैं जो हँस रहे हैवानियत पर l
    लुटी है आबरू, धिक्कार है इंसानियत पर l
    जहाँ रिश्ते दफ़न होते गए भीतर जमीं के,
    ज़हर हावी हुआ है आज फिर रूहानियत पर l

    अदावत चाहता है जो , कहो क्या आदमी है ?
    वसीयत चाहता है जो , कहो क्या आदमी है ?
    यहाँ तो जानवर भी साथ रहना चाहते हैं,
    अदालत चाहता है जो, कहो क्या आदमी है ?

    अगर हम आदमी हैं तो बने कानून कैसे ?
    सदाएँ शबनमी हैं तो बने कानून कैसे ?
    धुआँ तो कह रहा है आग भी होगी कहीं पर,
    हवाएँ मौसमी हैं तो बने कानून कैसे ?

    अभी भी वक्त है ग़ैरत! ज़रा सी होश में आ l
    कमा ले प्यार की दौलत, ज़रा सी होश में आ l
    बुजुर्गों की नसीहत याद कर, कर ले मुहब्बत ,
    कभी तो भूल जा नफ़रत, ज़रा सी होश में आ l

    ©prashant_gazal

  • prashant_gazal 5d

    दोहा मुक्तक

    राम सत्य प्रतिरूप हैं, कृष्ण पूर्ण आयाम l
    बल शाश्वत हनुमान का , विघ्न हरें बलराम l
    महादेव के नाम में , बसी अलौकिक शक्ति ,
    भक्ति-भाव का योग ही , सफल बनाता काम l

    महादेव, विषधर, अनघ, नीलकण्ठ भगवान l
    रूद्र, जटाधर, चंद्रधर , गंगाधर , ईशान l
    वृषभारूढ़, अघोर, हर, आशुतोष , केदार ,
    महाकाल, वृषकेतु, शिव, नमो महेश महान l

  • prashant_gazal 1w

    सुराग-ए-उम्र-ए-गुजिश्ता - Clue of previous life

    221 2121 1221 212

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    ग़ज़ल

    ताज्जुब है! बेवफ़ा भी वफ़ा ढूँढता रहा l
    हर शख़्स आशिक़ी में नफ़ा ढूँढता रहा l

    अपने सभी बुजुर्ग घरों से निकाल कर,
    इंसान पत्थरों में ख़ुदा ढूँढता रहा l

    उसका सुराग-ए-उम्र-ए-गुजिश्ता न पूछिए,
    जो ज़िंदगी में सिर्फ़ मज़ा ढूँढता रहा l

    तेरे करम नसीब बनाते, बिगाड़ते ,
    पर तू हथेलियों में लिखा ढूँढता रहा l

    शब आपके बग़ैर 'ग़ज़ल' इस कदर कटी,
    जलता हुआ चराग हवा ढूँढता रहा l
    ©prashant_gazal

  • prashant_gazal 1w

    छंद- विजात
    मात्रा - १४

    ISSS ISSS

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    चुनाव

    चुनावों का बजा डंका l
    डरी सीता, सजी लंका l
    वही वादे, वही नेता l
    प्रजा है राज-निर्णेता l
    करो दुष्कर्म में खर्चा l
    बताओ धर्म की चर्चा l
    कहीं इस्लाम बोलेगा l
    कहीं हिंदू टटोलेगा l
    हमारा ध्येय है चंगा l
    बहा दो रक्त की गंगा l
    जहाँ दंगे कराएंगे l
    वहाँ पैसे लुटाएंगे l
    अमीरों को मनाना है l
    गरीबों को लुभाना है l
    पता क्या दाल-रोटी का ?
    मजा लो जाम -बोटी का l
    कई मुद्दे उछालेंगे l
    गड़े मुर्दे निकालेंगे l
    किसे लूटा, किसे मारा ?
    कहीं चूना, कहीं चारा ?
    हमें तो झूठ गाना है l
    सभी को बेच खाना है l
    नया विश्वास हो जाए l
    पुरानी याद खो जाए l
    न कोई प्रश्न आएगा l
    अनोखा जश्न आएगा l
    कभी झूठा, कभी सच्चा l
    सभी को दे गया गच्चा l
    हुई सत्ता हमारी है l
    हमारी सेंधमारी है l
    कहा था जो, न भावी थे l
    अजी वादे चुनावी थे l
    उन्हें भूलो, उन्हें भूलो l
    खुशी से यों नहीं फूलो l
    मिलेंगे पाँच सालों में l
    अभी हैं व्यस्त चालों में l
    हमें ये जानकारी है l
    अभी सत्ता हमारी है l
    ©prashant_gazal

  • prashant_gazal 1w

    ग़ज़ल (हुस्न)

    दर-हक़ीक़त ख़्वाब का पुतला बनाकर देखता l
    यार यूँ तुमको 'ग़जल' तुम-सा बनाकर देखता l

    अब्र के मानिंद काले गेसुओं का हुस्न मैं ,
    नागिनों को गूँथकर रस्सा बनाकर देखता l

    तीर बन दिल चीरती, तिरछी निग़ाह-ए-यार को,
    चौदवीं के चांद का हिस्सा बनाकर देखता l

    गाल पे ग़रहे पड़ें जब खिलखिलाकर तुम हँसो,
    मैं इन्हें शबनम भरा प्याला बनाकर देखता l

    दो नशीले लब हज़ारों गुल जहाँ फीके, उन्हें,
    अधपके अंगूर का जोड़ा बनाकर देखता l

    आ सजे सावन उसी इक शोख़ गर्दन के लिए,
    इक लचीली डाल का झूला बनाकर देखता l

    इस कमर की कत्ल करने की अदा को देखने,
    तीर , तरकश से जुदा होता बनाकर देखता l

    हाथ में जो हाथ ले लो , धड़कनों की शामतें,
    जी चुका हूंँ, मौत को अपना बनाकर देखता l

    शुक़्र इतना है सनम तुम सिर्फ़ इक इंसान हो,
    ग़र ख़ुदा होतीं, 'ग़ज़ल' क्या क्या बनाकर देखता ?

    ©prashant_gazal

  • prashant_gazal 2w

    दोहावली ( रिश्ता)

    भ्रमर दोहे
    मगण तगण गुरु मगण तगण
    SSS SSI S SSS SSI

    पाला-पोसा प्राण दे, माता ने संसार l
    हे देवी माँ! आपकी, पूजा बारम्बार l

    छाया देते वृक्ष-सी , झेलें झंझावात l
    ऐसी मेधा धन्य है, जै जै जै श्री तात l

    भाई जैसी मित्रता, दीदी जैसा प्यार l
    दूजा होता ही नहीं, ढूँढे लाखों द्वार l

    नारी में नारायणी , नारी ही उत्थान l
    भार्या के सम्मान से, भर्ता आयुष्मान l

    संतानों के रूप में , आता है उल्लास l
    आरोगी संतान से , आनंदी आवास l

    सत्याग्राही विश्व को, देते जो सद्-ज्ञान l
    रिश्तों से ऊँचे गुरू, शिष्यों के सम्मान l

    © प्रशांत
    ©prashant_gazal

  • prashant_gazal 2w

    212 212 212 212

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    ग़ज़ल (इश्क़)

    इस तरह ज़िंदगी का गुज़ारा हुआ l
    इश्क़ हर रोज़ उनसे दुबारा हुआ l

    हर अना हो गई है फ़ना ख़ुद-ब-ख़ुद ,
    इश्क़ से इश्क़ ऐसा हमारा हुआ l

    होश होता तो कहते जवाँ कब हुए ?
    कब निग़ाहें मिलीं, कब इशारा हुआ ?

    हुस्न उनका अगर एक सफ़ में कहूँ,
    चाँद है आसमाँ से उतारा हुआ l

    ख़ुश-ख़ुमारी हमारी, हमारी नहीं,
    है सुरूर-ए-मुहब्बत निखारा हुआ l

    आशिक़ों बात तुम भी यही फिर कहो,
    दिल हमारा 'ग़ज़ल' , लो तुम्हारा हुआ l
    ©prashant_gazal

  • prashant_gazal 6w

    ग़ज़ल ( किताब)

    बहरे मुजतस मुसमन मख़बून महज़ूफ
    मुफ़ाइलुन फ़इलातुन मुफ़ाइलुन फ़ेलुन
    1212 1122 1212 22


    कहीं पे ख़ार , कहीं पे गुलाब होता है l
    यहाँ नसीब के ज़रिए हिसाब होता है l

    सफ़र में दूर करे जो सियाह अंधेरा ,
    चराग़-ए-इल्म वही आफ़ताब होता है l

    अमीर हो तो सुनो ऐब सैकड़ों पालो ,
    ग़रीब का तो हुनर भी ख़राब होता है l

    मुझे सवाल परेशान कर नहीं सकते ,
    अजी! ज़वाब मेरा लाज़वाब होता है l

    मशाल कौन जलाए, किसे थमाए अब ?
    लहूलुहान बड़ा इंक़लाब होता है l

    शराब प्यास बुझा दे , कबाब बिस्मिल्ला,
    तलाश कौन करे क्या सराब होता है?

    जह-ए-नसीब अगर ये समझ सके दुनिया,
    'ग़ज़ल' का शेर मुकम्मल किताब होता है l
    ©prashant_gazal

  • prashant_gazal 9w

    12122 12122 12122 12122

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    रुबाई (वतन)

    भगत सरीखा भगत बनूँ मैं, कलाम सा इक कलाम लिख दूँ l
    सुभाष,बिस्मिल,पटेल, आजाद संग अपना भी नाम लिख दूँ l
    जियूँ वतन के लिए उमर भर, मरूँ वतन को सलाम देकर,
    तमाम दौलत , तमाम शोहरत वतन के आगे हराम लिख दूँ l

    ©prashant_gazal

  • prashant_gazal 9w

    ग़ज़ल (मैं)

    1222 1222 1222 1222

    किसी की आंख का आंसू, किसी की मुस्कुराहट हूँ l
    मुहब्बत हूँ, अज़ल से आशिकों के दिल की आहट हूँ l

    कभी झुंझला न जाना बारहा गर खैरियत पूछूँ ,
    मैं माँ की छटपटाहट हूँ, पिता की बौखलाहट हूँ l

    अगर छेड़ा गया तो कम नहीं तूफान-आंधी से ,
    वगरना आपकी ख़ातिर हवा की सरसराहट हूँ l

    मुझे कुदरत कहो या ज़िंदगी की असलियत कह लो ,
    गम-ए-शब हूँ कभी सहर-ए-ख़ुशी की जगमगाहट हूँ l

    कई ज़ज़्बात उमड़ेंगे कहीं अंदर मुझे सुनकर ,
    'ग़ज़ल' का शेर हूँ मैं धड़कनों की धड़धड़ाहट हूँ l

    © 'ग़ज़ल'