rahat_samrat

शब्दों की यात्रा ✍

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  • rahat_samrat 2d

    सुमेरु छंद (मात्रिक)
    चरण- 4 (दो-दो चरण समतुकांत)
    विधान - ISSS ISSS ISS

    शीर्षक- निराशा
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    छंद- सुमेरु
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    निराशा न्यूनतम मस्तक सुरक्षित,
    बड़ा गन्तव्य उन्मित मार्ग विकसित।
    तितिक्षा ओज का विस्तार देती,
    क्षितिज को अंबु सा अभिसार देती।

    निराशा क्षीण रुग्णित वीथिका हो,
    तृषा हो तृप्त कुंठित गीतिका हो।
    क्षुधारत हो नयन कैसे प्रफुल्लित,
    हृदय में भ्रांति का संताप स्थित।

    निराशा निम्न भावों को सुधा दे,
    प्रभा अरु कांति को संगम क्षुधा दे।
    विकारों में भरे उन्माद रंजित,
    सुभा सी वीथिका का सार चिंतित।

    निराशा व्याप्त होते ही शिथिलता,
    अरुण धुंधला दुखी रजनीश खिलता।
    मनुज आहत हुआ परिवेश भारी,
    निराशा ही करुण निंदा हमारी।

    ©rahat_samrat

  • rahat_samrat 3d

    विजात छंद (मात्रिक)
    चरण- 4 ( दो-दो चरण समतुकांत)
    विधान- ISSS ISSS

    शीर्षक- शिल्पजा
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    छंद- विजात
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    विभा वाचाल विस्तारी,
    प्रभा पुण्यादि प्रस्तारी।
    दुखों की दाहिका द्वन्दी,
    अहंकारी मनः नन्दी।

    युगों की पावनी गीता,
    सुआ मोहक मृषा पीता।
    विकारों की सुधा वाणी,
    क्षुधा की रिक्तता प्राणी।

    हुआ विस्तार यूँ भारी,
    पुरातन शिल्पजा हारी।
    गुरू लघुता दिखे रोती,
    कहाँ अश्रु: लहे मोती।

    महावर लाल शृंगारिक,
    पुनः पाठन हुआ दाहिक,
    प्रफुल्लित मंजरी डोले
    व्यथा की खंजरी बोले।

    ©rahat_samrat

  • rahat_samrat 1w

    जय श्री कृष्ण��

    शैलसुता छंद
    चरण- 4 ( दो-दो या चार चरण समतुकांत)
    विधान- IIII SII SII SII SII SII SII S

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    छंद
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    सलिल सुधाकर सुंदर सर्व सुकोमल साहस सर्वस हे,
    शिखि शशि श्याम ललाम विहाम सुनाम स्वबाम सुधारस हे।
    कुसुमित कुंज मुकुंद मनोहर मोहन मिथ्य विदारक श्री,
    प्रियपति संग प्रिया शिखि वर्ण विहार महोदधि पालक श्री।

    अविरल आदिक आद्य अनादिक देखि छ्वी हिय भार हरी,
    सरस सुधामय सम्यक नाहि विभा प्रभु मोहि विचार हरी।
    प्रभु विनती जुबती सुमती कुमती करतार कृपाल हरी
    नित नव नेति विहान नियंत्रक नौमि नरायण भाल हरी।

    छण किह कारज ठानि सुआनि परे प्रभु भोर निशा घन की।
    कहु किह कृत्य सुकृत्य प्रभू जिह जानि सकै करुणा मन की।
    व्यथित विचार अचार महा व्यभिचार पुकार प्रियापति हे,
    सुमिरु रसाल तिहूँ कर जोरि हरौ भय मोरि विभोर महे।

    गिरिवर गोपिक ग्वाल मराल सुभाल यशोमति लाल नमो,
    अमिय अलौकिक अम्बु सु अन्त्य अनंत्य अनादि स्वभाल नमो।
    मनहर मुग्ध मनोहर माधव मोहन मीत सुजीत नमो,
    वरुण विभावरि वर्ण विदारक वक्ष विकार विनीत नमो।

    ©rahat_samrat

  • rahat_samrat 1w

    जय श्री कृष्ण

    श्याम रूप शशि वर्ण ज्यों, पुंज प्रकीर्णन रम्य,
    निशि वर्णति कोमल नयन, अंबु विभावरि क्षम्य।

    ©rahat_samrat

  • rahat_samrat 1w

    शीर्षक- गंतव्य

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    सिंहावलोकन कुंडलिया

    ताके नैनन नीर ज्यों, अविरल आहत गंग,
    गंग सिंधु अहिवात जे, संग उदधि क्षिति संग।
    संग उदधि क्षिति संग, गंग विरुदावलि कंचन,
    कंचन वर्ण विकार, प्रमाद विदारक तन तन।
    तन तंद्रा जे नींव, हेतु विचलित मन वाके,
    वाके प्रति गंतव्य, मार्ग बाधित दृग ताके।

    ©rahat_samrat

  • rahat_samrat 3w

    आप सभी को नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ ������

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    श्रीकृष्ण
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    हरि सरिता अमि क्षीर लहे प्रभुता हरिनाम सुनाम प्रभू,
    गिरिवर नंद सुनंद सुधा मकरंद कृपालु प्रणाम प्रभू।
    अविरल नूतन सस्य जिमी तिह नौमि विहान सु आन परे,
    तिह पद बारमबार नमामि प्रियापति श्री भगवान हरे।

    ©rahat_samrat

  • rahat_samrat 3w

    शीर्षक- प्रेम परिहार
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    शैल सुता छंद
    चरण- 4 (दो-दो पद समतुकांत)
    विधान- IIII + भगण (6) + गुरु
    IIII SII SII SII SII SII SII +S

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    छंद
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    सहज रहा मन पीर सुनी हिय सन्मुख साहस आस परे,
    नहि हिय अश्रु अटाय जबै दृग दारुण दैहिक हास करे।
    अविरल तीव्र प्रवाह अरू घट कालहि रूप निहार रही,
    मरघट जे हिय आँखर सुप्त निशा सुधि त्याग प्रहार रही।

    शशि लघु रूप छटा तिह नाहि बिसारि सकूँ दुइ नैनन ते,
    प्रिय परिचारि नही हिय तोर प्रभाव इहाँ किह कारन ते।
    सरस सुधारस नाहि प्रमाण दयो जन जाहि विचारन जे,
    शिथिल शिला जस एकटकी तिह होत प्रपंच दुशासन जे।

    लखि परिहार विहार मनै मन अंकुश नाहि शिखी जिय मा,
    तजि हिय आस विलास भई पिकि जे स्वर जानि जुरे हिय मा।
    मन नहि शांति अशांति विभा लखि छद्म सुसज्जित सार सखी,
    अलक महावर पैंजनि ते हिय पावस मंजुल हार सखी।

    ©rahat_samrat

  • rahat_samrat 4w

    अंतर्द्वंद ने क्रम को क्रमशः ही रहने दिया है।

    एक बार फ़िर ✍

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    अंतर्द्वंद✍

    अंतर्द्वंद में फँसे इस रुदन को तुम्हारे साथ ही चले जाना चाहिए था, ताकि यह ठहरी हुई अंतस विरह यूँ हर पहर एक भार न लगती।

    कोयल इंतजार करती है कि कब वृक्ष में बौर आये और कब वह अपनी आवाज से सबको मोहित करे, वह वर्ष भर क्यों नही बोलती? वह विरह जो सिर्फ़ बौर के उत्पन्न होने से दूर होती है ऐसा क्यों? कोई तथ्य अवश्य है। हाँ विज्ञान में मगर क्या भावना विज्ञान में ठहरती है?

    अर्थ मिलना अगर सम्भव होता तो मण्डूक से भी पूछती कि आख़िर वह वर्षा ऋतु में ही क्यों बोलते वर्ष भर क्यों नही, मण्डूक को पता है कि उसकी आवाज से सर्प उसे अपना भोजन बना सकतें है पर वह उस समय नही घबराता क्यों?

    आवाज आती है हृदय की हृदय को कि हृदय अगर परिवर्तन करना है तो बोलना पड़ता है अपने लिए ही कभी कभी भिन्न भिन्न परिस्थितियाँ सँजोनी पड़ती है एक हँसी के लिए, पर कुछ समय पश्चात फ़िर वही कहानी दोहराती हैं ये अमावस सी काली रातें जो कोयल और मण्डूक की तरह वर्ष भर के इंतजार का रुदन सँजोये जाती हैं।

    पर अंतर्द्वंद का क्या?
    जवाब- वह जीवनपर्यंत यूँ ही निरंतर गति से नदी के वेग के समान प्रवाहित होता रहेगा, जिसे किसी सिन्धु की मौजूदगी से भी घृणा होगी।
    ©rahat_samrat

  • rahat_samrat 4w

    ग़ज़ल

    2122 2122 2122 2122

    आज मागूँ आसमा माँ देह धरती मान लेती,
    तोड़कर कोई कली अवरुद्ध साँसे जान लेती।

    रो रही कोई दिखा ना जो सुने चीत्कार मेरा,
    आज द्रोपति हो गई क्यों बेटियाँ विषबान लेती।

    हम पढ़े हम भी बढ़े यह भावना संसार की है,
    पर नही क्यों चाहते हो जन्म, बेटी शान लेती।

    तोड़कर कब तक चलूँ मैं बेड़ियाँ पैरों तले जो,
    जान मेरी कीमती कर दो, कमीँ शमशान लेती।

    ना डरूँ मैं भी कभी, वीरांगना गर मान लो तुम,
    जंग राहत हौसलों से जीत हिंदुस्तान लेती।
    ©rahat_samrat

  • rahat_samrat 4w

    था घोर तिमिर कल आज नवल,
    गंतव्य एक, पथ जारी रख।
    क्यों विकल पथिक क्यों भय विकार,
    हुँकार उठा हठ जारी रख।

    गीत - अमि मंथन✍

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    अमि मंथन

    विफल मात्र भय उपजाता,
    क्या हृदय पराजित होता है।
    स्मरण रखो तुम योद्धा हो,
    प्रण,युद्ध कदाचित होता है।

    तड़ाग सिंधु भी होते हैं,
    मन धीरज की रसधार भरो।
    उठ देख नवल नित नूतन को,
    खग तू भी है, चहकार भरो।
    तम छद्म त्याग ये विषधारी,
    नभ पल-पल विकसित होता है।
    स्मरण रखो तुम योद्धा हो,
    प्रण, युद्ध कदाचित होता है।

    ये पुष्प परागण, जल, मरुथल,
    हैं भिन्न प्रक्रति पर सार एक।
    नव पल्लव नव निर्माण हेतु,
    बनकर चलना परिवार एक।
    संघर्ष शीर्ष गर वर्णिम हो,
    अमि मंथन निश्चित होता है।
    स्मरण रखो तुम योद्धा हो,
    प्रण युद्ध कदाचित होता है।
    ©rahat_samrat