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  • rangkarmi_anuj 5d

    आकर्षण

    प्रेम के प्रति आकर्षण जैसे सूर्य के प्रति
    सौरमंडल का है
    ऊर्जा,संचार, जीवन,
    सृजन, अर्जन, वर्जन
    और उत्सर्जन समस्त
    एक ही कण और अणु
    में सम्मिलित हैं,
    एक और समांतर है "आत्मा और देह" का।

    स्त्री-पुरूष का अपनत्व तो
    चुम्बकीय शक्ति की भाँति है,
    यदि अधिक प्रेम है तो आलिंगन
    यदि क्रोध है तो पृथक,

    उदाहरण
    जब दो चुम्बकों को एक साथ लाया जाता है,
    तो विपरीत ध्रुव एक दूसरे को आकर्षित करेंगे,
    लेकिन समान ध्रुव एक दूसरे को प्रतिकर्षित करेंगे।
    यह विद्युत आवेशों के समान है।
    जैसे आवेश प्रतिकर्षित करते हैं,
    और विपरीत आवेश आकर्षित करते हैं।

    हम मनुष्य में स्त्री-पुरूष में विज्ञान का प्रेम है
    हम रसायनिक, भौतिकी
    और भूगोलिक विषयों से घिरे हुए हैं,
    हम एक ऐसे आकर्षण, समर्पण, त्याग
    रस के चक्रव्यूह में बंधे हुए हैं
    जो अंत में शून्य कर देता है

    अर्थात गणित का भाग, गुणा,
    जोड़, घटाव और साथ में आता है नक्षत्र, काल, योग
    महायोग, मार्गी और मारक
    अंत में सब कुछ भस्म।
    ©अनुज शुक्ल "अक्स"
    ©rangkarmi_anuj

  • rangkarmi_anuj 1w

    सितारे

    क्या हम समझ
    या महसूस कर पाएंगे
    उस पीड़ा को जब
    हम कभी गर्भ में थे,
    या उठा पाएंगे उस
    बोझ को जो कभी
    हमारा बोझ उठाया करते थे,

    हम मात्र कल्पना कर लेते हैं, सामने बस देखते हैं
    महसूस करना नहीं,बल्कि उससे बचना चाहते हैं।

    हमारी ज़िम्मेदारी हमें भी
    वो सब कराएगी जो
    हम नहीं किये थे कभी,
    क्योंकि उस समय रक्त
    हमारा तो नहीं था,
    और जब हमारा होगा
    वो बहुत अपना और
    अतिप्रिय होगा स्वयं से अधिक,

    शाखाएं साथ छोड़ देती हैं, एक पल के बाद
    लेकिन जड़ और तना उन्हें अलग नहीं करते कभी।

    हमारी पीढ़ी हमें भूल जाएगी
    हम जब पीछे हो जाएंगे,
    और जो हमारे पीछे थे
    वो सितारे बन चुके होंगे,
    हम उन्हें ढूंढेंगे रात में
    वो कभी मिलेंगे नहीं
    क्योंकि वो एक नहीं
    अनगिनत हैं बस जो
    दिख जाएगा वही अपना है,

    हम भी सितारे बन चुके होंगे, हमारे तारे चले जायेंगे
    पर हमें कोई नहीं देखेगा क्योंकि ज़मीन पर रौशनी बहुत है।
    ©अनुज शुक्ल "अक्स'
    ©rangkarmi_anuj

  • rangkarmi_anuj 1w

    व्यंग्य

    यदि जीवित रह जाते
    तो प्रश्न कैसे बनते
    उस भोर के समाचार के
    मुख्य समाचार कैसे बनते,
    इस संसार में जीवित नहीं
    मृत बहुत विशिष्ट है
    जो जीवित है यदि
    वो संसार में अशिष्ट है।

    मिथकों की भाँति प्रेम
    और सत्य में घृणा है
    छल, लोभ तो परम
    पग पग में मृगतृष्णा है,
    मान सम्मान वैभव ही
    सबको जीवित रखती है
    जो दुर्बल लाचार है
    उसमें मृत्यु दिखती है।

    समाज राज प्रजा को
    मात्र घोषणपत्र दिखाया है
    घोषणापत्र के शब्दों को
    मध्यान्ह भोजन में बैठाया है,
    सारे तंत्र तुच्छ हो गए
    प्रत्येक राजतंत्र के आगे
    महाराज काली पट्टी बांध रहे हैं
    देखो प्रजातंत्र के आगे।
    © अनुज शुक्ल "अक्स"
    ©rangkarmi_anuj

  • rangkarmi_anuj 2w

    रिक्त

    सुनो
    मैंने अनुशीर्षक
    रिक्त रखा है मैं वहीं पर हूँ,

    उसपर तुम शब्द लिखना
    मैं मात्र शीर्षक लिखूंगा
    और शेष में रचनाएं होंगी,

    मैं उस रिक्त स्थान पर
    अवश्य हूँ, पर तुम मुझे उसपर
    स्थान देना, सम्मान देना,
    समर्पण देना, प्रेम देना

    जैसे देते हैं घर के
    कुलदेवी देवता को
    होम-ग्रास और भोग,
    धूनी, घी-गुड़ का प्रसाद।
    ©अनुज शुक्ल "अक्स"
    ©rangkarmi_anuj

  • rangkarmi_anuj 2w

    अनुदान

    एक ही आश्रय में
    जीवनयापन कर के
    वहीं पर बढ़के
    श्रम कर के
    देह त्याग देती है चींटी
    उसकी संघर्ष की
    कहानी लिखी होती है
    एक ही आश्रय में,

    उसकी बाम्बी में भी होते हैं
    पुरातत्वो की भांति
    उदाहरण जैसे मनुष्यों के
    अजंता-एलोरा, भीमबेटका
    और उदयगिरि की गुफाएं
    सम्भवतः हम अपनी चिन्हारी
    को संजो लेते हैं सुरक्षित कर लेते हैं,

    परन्तु चींटी उसका आश्रय तो
    हमारी तलवों में दब कर
    हमारे घर की भित्ति में
    गेरू बनकर चिपका रहता है।

    हम ऋणी हैं उसके
    क्योंकि हम उसके आश्रय में
    रहते हैं, विश्राम करते हैं,
    विभाजन करते हैं, पीढ़ी को
    सौंप देते हैं, वो अपनी पीढ़ी को
    सौंप देती और चींटी का आश्रय
    मुनष्य का हो जाता है,

    चींटी के पास मनुष्य जैसी बुद्धि नहीं होती है
    क्योंकि उसे अजंता-एलोरा, भीमबेटका
    और उदयगिरि की गुफा में की गई
    कलाकृति नहीं करनी आती है
    और वो सरकार से अनुदान भी
    प्राप्त नहीं कर सकती है।
    ©अनुज शुक्ल "अक्स"
    ©rangkarmi_anuj

  • rangkarmi_anuj 3w

    शेष-अवशेष

    शेष भी समस्त अवशेष हो जाएंगे
    अश्रु, स्वेद, पीड़ा विशेष हो जाएंगे,

    तम की काली सतह कंपन करेगी
    उसी तम में रात्रि मंथन करेगी,
    समस्त सुख साधन वेष हो जाएंगे
    ओज भी मात्र शेष हो जाएंगे।

    शेष भी समस्त अवशेष हो जाएंगे
    अश्रु, स्वेद, पीड़ा विशेष हो जाएंगे,

    जीवन क्षण क्षण में निरुत्तर होगा
    बिंब प्रतिबिंब का ही प्रतिउत्तर होगा,
    यातनाएं, गुंजन, गर्जन मूक हो जाएंगे
    मौन, शांत, शून्य अमुक हो जाएंगे।

    शेष भी समस्त अवशेष हो जाएंगे
    अश्रु, स्वेद, पीड़ा विशेष हो जाएंगे।

    दर्शक दीर्घा पर प्रतिरूप विराजमान होगा
    धरती के सतह पर अभिमान होगा,
    सहस्त्र अस्त्र शस्त्र विसर्जित हो जाएंगे
    द्वेष मित्रता परस्पर अर्जित हो जाएंगे।

    शेष भी समस्त अवशेष हो जाएंगे
    अश्रु, स्वेद, पीड़ा विशेष हो जाएंगे।
    ©अनुज शुक्ल "अक्स"
    ©rangkarmi_anuj

  • rangkarmi_anuj 3w

    राजधानी

    सोचता हूँ मैं एक राज्य
    बन जाऊँ और तुम मेरी राजधानी,
    अनगिनत प्रेम के जिले होंगे
    मेरा विस्तार और बहुत विस्तृत होगा
    परंतु मैं अपनी राजधानी के
    निकट रहना चाहूँगा,

    मेरे प्रेम की सीमाएं तुम तक रहेंगी
    और विधान परिषद की सभाएं
    तुम्हारे आँगन में लगेंगी
    शीत और ग्रीष्म की।


    मेरी राजधानी अर्थात तुम
    सबसे सुंदर और स्वच्छ होगी,
    मैं उसकी रक्षा के लिए
    सिपाही रखूँगा क्योंकि तुम
    अतिविशिष्ट व्यक्ति हो
    लाल बत्ती और रात्रि जुगनुओं
    से जगमगाती रहोगी,

    मैं प्रेम का विकास
    प्रेम के जिलों में करता रहूँगा
    जिससे तुम्हारी बढ़ोतरी होती रहेगी।

    तुम मेरे हृदय में रहोगी
    मैं रक्षक बनकर तुम्हारी रक्षा करूंगा,
    हमारा मिलन चुनाव से नहीं
    अपितु मेरी इच्छा से होगा,
    कोई बाधा, कोई किलेबंदी
    कोई भी आचार संहिता नहीं रहेगी
    कोई भी आपातकाल नहीं होगा
    मात्र मेरा शासन और राज होगा,

    मैं तुम्हारा प्रेम सेवक रहूँगा
    और तुम मेरी राजधानी
    मेरी केंद्र शासित राजधानी।
    ©अनुज शुक्ल "अक्स"
    ©rangkarmi_anuj

  • rangkarmi_anuj 4w

    जगमग

    जगमग जगमग इस धरती के
    तारे भी कहीं खो जाएंगे,
    कहीं किसी ठंडी सड़क पर
    छोटे छोटे बच्चे सो जाएंगे।

    उनकी नींद आधी जागी होगी
    क्या पता नींद आती होगी,
    बिट्टी रात में जागती होगी
    क्या पता वो ठिठुरती होगी।

    जगमग जगमग इस धरती के
    तारे भी कहीं खो जाएंगे,
    कहीं किसी ठंडी सड़क पर
    छोटे छोटे बच्चे सो जाएंगे।

    बबलू कांपता हुआ बैठा होगा
    क्या पता आग ढूंढ़ता होगा,
    कोई कंबल भी बांटता होगा
    क्या पता ख़ुद ओढ़ता होगा।

    जगमग जगमग इस धरती के
    तारे भी कहीं खो जाएंगे,
    कहीं किसी ठंडी सड़क पर
    छोटे छोटे बच्चे सो जाएंगे।

    रात गर्म क्यों नहीं रहती
    क्यों उन्हें सोने नहीं देती,
    ठंड भले दिन आ जाए
    रात को दूर चली जाए,
    बच्चे अख़बार लपेट लेटते हैं
    ठंडी रोटियां वो बटोरते हैं।

    जगमग जगमग इस धरती के
    तारे भी कहीं खो जाएंगे,
    कहीं किसी ठंडी सड़क पर
    छोटे छोटे बच्चे सो जाएंगे।
    ©अनुज शुक्ल "अक्स"
    ©rangkarmi_anuj

  • rangkarmi_anuj 4w

    सीप

    हम सीप को उठा लाएंगे पानी से
    और मोती को पानी की रजाई में सुला देंगे
    सीप की खोल में रात की स्याही डाल देंगे,
    फिर उसे रख देंगे मछलीघर में
    जिसमें मछली रखेंगी अपनी
    लोरियों की किताब और
    बाल कविताएं उसकी दराज में।

    पानी की रजाई में सोया हुआ मोती
    सपने देखने की कोशिश करेगा,
    हाथ पैर चलाएगा, करवट लेगा,
    और फिर छूना चाहेगा सीप का बिस्तर
    जो उसके पास था जिसपर वो सो था,
    शैवाल में बंद ज़्यादा हलचल नहीं
    कर पायेगा, जैसे करते हैं गर्भ में बच्चे
    लात मारने और हाथ चलाने के
    सिवाय कुछ नहीं कर पाते हैं।

    मछली रोज़ सीप में घुस कर
    अपने अपने पुस्तकालय में
    मनचाही किताब पढ़ेंगी,
    उनमें से कुछ अपनी किताब
    लिख कर वहीं रखना पसंद करेंगी,
    सीप का कमरा छोटा है
    पर उसमें जगह सबकी है
    रहने, पढ़ने, घूमने, खाने
    जीने, मरने, सांस लेने, सब कुछ
    एक इंसानी बस्ती और उनके घर के जैसे।

    लेकिन मोती को पानी में ही सोना पड़ेगा
    जब तक कोई इंसान उसे ले नहीं जाता है,
    वो पानी की रजाई में तब रहेगा
    जब तक शैवाल और काई हट नहीं जाती,
    वो भी उल्वीय कोश में रहेगा
    मनुष्य के शिशु की तरह,
    लेकिन उसके सीप में
    किसी और का कब्ज़ा हो चुका होगा।
    ©अनुज शुक्ल "अक्स"
    ©rangkarmi_anuj

  • rangkarmi_anuj 4w

    सैलाब का ठिकाना आजकल मेरे घर पर है
    खुशियों की महफ़िल आजकल उनके घर पर है

    मैं उसकी चौखट पर ख़ुशी देखने गया था
    अंदर से आवाज़ आई ख़ैरात तेरे दर पर है

    मैं ठहरा बहुत बेगैरत ढीठ कहाँ मानने वाला
    मैंने कहा तेरी बद्दुआ मेरे सर पर है

    दुआ नहीं मांगता हूँ और न मिलेगी कभी
    क्योंकि मेरी जान तो हर ज़हर पर है

    शब की मौत को मना कर दिया है
    इसलिए मेरी मौत सिर्फ़ उस सहर पर है

    मैं ज़िंदगी को ज़िंदगी कभी समझा ही नहीं
    क्योंकि मेरी ज़िंदगी पल पल कहर पर है
    ©अक्स
    ©rangkarmi_anuj