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  • reetey 54w

    बेचैनी में सोने वालों को अक्सर
    चैन मिले तो नींद नहीं आया करती

    - रीतेय


    ©reetey

  • reetey 79w

    रिश्तों में नमी थी, सो अमानत बनी रही
    सूखा नहीं कभी भी उसका दिया गुलाब

    - रीतेय । @imreetey

  • reetey 80w

    गाँधी तेरा देश

    गए चाँद तक, मंगल पर भी
    ख़ूब हुआ है सैर।
    दुश्मन को भी दोस्त बनाया
    ख़त्म किया कुछ बैर।

    स्वास्थ्य सुधारा, सड़के बनाई
    शिक्षित हुआ है देश।
    दिया विश्व को आगे बढ़
    हमने भी कुछ संदेश।

    किंतु इतना आगे आकर
    अब भी हम हैं पीछे
    मूलभूत सुविधाएँ से हैं
    अब भी नज़रें खींचे

    जनता आज सड़क पर उतरी,
    नेता मूक भवन में।
    संघर्षों की बाढ़ है उमड़ी
    जन-जन के जीवन में।

    सिर्फ़ वोट से नहीं यहाँ अब
    सरकारें बनती है।
    फ़ोटो वाले नोटों की ही
    आख़िर में चलती है।

    जिसने जितने नोट उड़ाए
    उसके उतने वोट।
    ढूँढ रहे अब नेता-जनता
    एक-दूजे में खोट।

    रोज़ मनाता होली ख़ूनी
    खबरों से अख़बार।
    लाल क़िला की प्राचीरें भी
    देखती दुर्व्यवहार।

    आज़ादी के मज़े लूटते
    किस तरह चोर उच्चके।
    अगर देखते बापू तुम
    रह जाते हक्के-बक्के।

    देख रही दुनिया भारत का
    कैसा-कैसा वेश
    देखो कैसे बदल रहा है
    गाँधी तेरा देश!

    - रीतेय

    ३० जनवरी २०२१

  • reetey 80w

    भीड़ नहीं करती है मुहब्बत
    और ना ही करती है नफ़रत
    मगर कर सकती है दोनों
    करवाए जाने पर।

    भीड़ ने बैठना सीखा है 
    पिछली सीट पर, आरंभ से,
    भीड़ की आदत है देखने की
    फिर उसे हू-ब-हू उतारने की

    भीड़ के लिए होता है आसान
    मुश्किलें पैदा करना
    कभी भी, कहीं भी 
    और किसी भी तय क़ीमत पर।

    भीड़ अक्सर लगती है मुफ़्त की
    मगर मुफ़्त की नहीं होती।
    मय्यत में भी नहीं!

    वो देर आती है 
    और दुरुस्त रहती है।

    - रीतेय

  • reetey 81w

    जिसने ताक़त दिया तुम्हें कि जिरह करो
    उसे ताक पर रख कर लड़ना ठीक नहीं।

    अहल-ए-वतन नाराज़ सियासत से हो, रहो
    मगर वतन को ताक पर रखना ठीक नहीं।

    - रीतेय
    ©reetey

  • reetey 81w

    उम्र उम्र की बात

    एक उम्र के बाद, 
    लड़के नहीं चाहते हैं प्रेमिकाएं। 

    अगर न हो, 
    तो नहीं होता है मलाल, 
    किसी के नहीं होने का।
    और अगर हो भी 
    तो की जाती हैं कोशिशें
    बदलने की,
    प्रेमिकाओं को जीवनसाथी में।

    एक उम्र के बाद, 
    नहीं रहता है शेष,
    उतनी उम्र और जवानी,
    कि लुटाया जा सके,
    दोनों को फिर एक बार।

    एक उम्र के बाद,
    कमजोर पड़ जाती हैं ज्ञानेंद्रियां।

    नाक कर देती है इंकार,
    एक खास खुशबू के अलावा 
    तमाम सुगंधों को।
    वो ख़ुशबू जिसकी मौजूदगी में,
    नाक स्वेच्छापूर्वक खींच लेता है,
    एक लम्बी साँस, सुकून की।

    कान ठिठक जाना चाहता है,
    उसी एक आवाज़ पर 
    जो उसे लगने लगता है अपना सा।
    वही एक अभ्यस्त आवाज़, 
    जिसमें कही गयी तमाम बातें 
    अक्सर अच्छी लगती है।

    आँखें नहीं चाहती हैं देखना
    फिर से कोई नयी सूरत।
    नहीं होती है तमन्ना
    किसी दो और आँखों में खोने की।
    नहीं चाहती है कि खाली हो,
    अपने अंदर का कोई कमरा।
    नहीं चाहता है क्षण भर को भी,
    वो अपने अंदर एक खालीपन।

    हाथों को लग चुकी होती है आदत,
    एक ख़ास नर्म, सुंदर और गर्म हाथों की,
    जिसे थामते हुए हो जाता है एहसास
    मानो दुनिया के अंदर,
    एक दुनिया सिमटी जा रही हो।
    नहीं चाहता है हाथ नापना ज़िंदगी को,
    फिर से किसी और हाथों की उँगलियों में।
    नहीं चाहता है एक नयी लक़ीर,
    किसी और हाथों की नाखूनों से।

    एक उम्र के बाद, 
    ज़िंदगी तय कर चुकी होती है,
    ज़रूरतें, ज़िम्मेदारी, ख़्वाहिश, ख़ुशी
    स्नेह, सम्मान, स्वीकृति, समर्पण
    सब कुछ। 
    एक उम्र के बाद, 
    उम्र नहीं चाहता है ख़ुद को दोहराना।

    -रीतेय
    १२/३१/२०१९
    ©reetey

  • reetey 81w

    मैं नहीं ला सकूँगा 
    तुम्हारे लिए तोड़कर कुछ भी।

    क्योंकि, प्रेम में
    कुछ भी तोड़ना अच्छा नहीं है। 

    वादे, दिल, चाँद या कुछ भी!

    -रीतेय
    ©reetey

  • reetey 82w

    आईना देखते हुए
    ख़ुद से एक सवाल किया।
    उदास हो?
    उत्तर मिला, नहीं!
    सवाल बदलकर पूछा
    ख़ुश हो?
    उत्तर नहीं बदला!

    एहसास हुआ कि कभी-कभी
    अपने अंदर
    मध्यस्थता करते हुए,
    कुछ लोग
    कहीं के भी नहीं हो पाते हैं!

    - रीतेय
    ©reetey

  • reetey 83w

    हर बार नहीं की जा सकती है
    एक नयी शुरुआत।
    गुजरते हुए,
    छूटता चला जाता है इंसान हर जगह।
    क्योंकि,
    हर बार नहीं होता है आसान
    समेटना,
    बिखरे हुए ख़ुद को।

    कल जहां था, पूरा नहीं था।
    कल जहां होगा, पूरा नहीं होगा।

    कभी-कभी लगता है कि डरता है इंसान
    पूरा हो जाने से।
    डर यही की ज़िंदगी पूरी हो जाए
    तो ज़िंदगी नहीं रहती।

    मैं भी नहीं ढूँढ सकता हर बार
    एक ख़ाली पन्ना
    और इसलिए कभी-कभी
    रह जाती है कविताएँ अधूरी।

    — रीतेय
    ©reetey

  • reetey 83w

    थोड़ा तो अपनी शान-ए-सितम का ख़्याल कर
    आँसू बह़ाल कर मेरे आँसू बह़ाल कर

    पाने का जश्न अपनी जगह है मगर कभी
    जो खो दिया है उसका भी थोड़ा मलाल कर

    कितने जवाब तेरे ही अंदर हैं मुंतज़िर
    ख़ुदसे नज़र मिला कभी ख़ुदसे सवाल कर

    - राजेश रेड्डी