Grid View
List View
  • rohit_kushwaha 3d

    यूँ तो हैं दुनिया-भर के मैख़ाने नशा करने के लिए
    लेकिन, तेरे आँखों की बात ही कुछ और है
    ©rohit_kushwaha

  • rohit_kushwaha 4d

    तू बड़ा होगा तो होगा, मैं भी कुछ कम नहीं
    क़ायम दोनों का भरम रहा, क्या इतना काफ़ी नहीं
    ©rohit_kushwaha

  • rohit_kushwaha 2w

    हमने ख़ामोश रह कर भी महफिलों को रुलाया है
    हंगामा ही हो जाए जो कभी हाल-ए-दिल कह दें
    ©rohit_kushwaha

  • rohit_kushwaha 4w

    उसे छुप-छुप के देखा करता था
    ज़माने को ख़फ़ा करने से जो डरता था
    ©rohit_kushwaha

  • rohit_kushwaha 4w

    ज़िंदगी का होना कम था क्या जो तू भी मुझसे ख़फ़ा हो गया?
    ©rohit_kushwaha

  • rohit_kushwaha 5w

    अंगडाईयां लेते कुछ ख़्वाब, बेचैन हैं दौड़ लगाने को
    अरमानों को पंख लगा के , पिंजरे तोड़ उड़ जाने को
    ©rohit_kushwaha

  • rohit_kushwaha 5w

    Meri Mathematical Life

    Pata nai logon ka relationship status COMPLEX kaise ho jata hai. Mere relationship ka to saala PROBABILITY hi nai banta. Ab tak ka to STATISTICS bhi kharab hai. Ab tak to LINEAR hi rahe hain pata nai quadratic kab honge. Zindagi me galtiyan itni ki hain k LIMIT hi exist nai karti. Problems ka to bus INTEGRATION ho raha hai, khusiyon ka PARTIAL hi nai saala FULL DIFFERENTIATION ho raha hai. Aur problems aise hai k solutions PARTICULAR to kya GENERAL bhi nai nikal raha hai. Zindagi bhi saala VECTOR se SCALAR ho gai hai, chalte ja rahen hai par direction nai hai. Hey bhagwan zindagi thodi CONVERGE Karo DIVERGENCE Bahot hai. Jaldi se koi TRANSFORMATION laga do aur life ambassador se Ferrari bana do.
    ©rohit_kushwaha

  • rohit_kushwaha 6w

    कुछ लिखा नहीं मैंने बहुत दिनों से
    शायद तुम्हारी याद नहीं आई बहुत दिनों से
    अब तो नींद भी टुकड़ों में आती है मुझे
    शायद तुम्हारी चाप नहीं सुनी बहुत दिनों से
    ©rohit_kushwaha

  • rohit_kushwaha 7w

    कब दिन हुआ कब रात, के अब ख़बर नहीं
    अब गुम हैं हम कहाँ, के अब ख़बर नहीं
    कुछ रह गया मुट्ठी में, कुछ फ़िसल गया
    क्या खोया क्या पाया, के अब ख़बर नहीं
    आंखों के सामने भी हो, आँखों से ओझल भी
    क्या हक़ीक़त है क्या भरम, के अब ख़बर नहीं
    यहाँ सबके होठों पे हँसी, हाथों में खंजर है
    कौन दुश्मन है कौन दोस्त, के अब ख़बर नहीं
    चारासाज़ी भी काम नहीं आती, अब साँस भी नहीं आती
    ज़िन्दा हैं या मर गए, के अब ख़बर नहीं
    ©rohit_kushwaha

  • rohit_kushwaha 7w

    कोई किस्सा पुराना याद आया, वो बीता ज़माना याद आया
    जब ज़िक्र हुआ अफ़सानों का, कोई गीत पुराना याद आया
    कोई इश्क़ पुराना याद आया, एक हुस्न सुहाना याद आया
    जब ज़िक्र हुआ दीवानों का, कोई एक दीवाना याद आया
    एक दोस्त पुराना याद आया, कोई एक फ़साना याद आया
    जब ज़िक्र हुआ अपनों का, कोई एक अंजना याद आया
    एक सफर पुराना याद आया, वो एक बंजारा याद आया
    जब ज़िक्र हुआ आशियानों का, कोई भूला ठीकाना याद आया
    एक दर्द पुराना याद आया, एक मज़लूम बेचारा याद आया
    जब ज़िक्र हुआ चारासाज़ी का, कोई ज़ख्म पुराना याद आया
    ©rohit_kushwaha