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  • ruchitashukla 3w

    गुज़रता रहा वक़्त जज़्बात ठहेरते रहे!

    दिन रात गुज़रते वक़्त के मूक साक्षी बनते रहे!

    वक़्त की रेत मे लिपटी जिंदगी अपनी कहानी कह रही है!
    बचपन से बुढ़ापे का सफ़र सहती मंजिल पर खड़ी ये जिंदगी!

    रंग बदलते आसमान की तरह कुछ राहें खोयी सी!
    कुछ पाकर कुछ अधूरा सा काश वो पल दोहराया जाए!

    बेखोफ जिंदगी की तलाश मे गुजरती जा रही जिंदगी!
    अपनी खामियों का बोज उठाते रहे!

    आँखों मे टूटे काँच के टुकड़े चुभते गये!
    हाथों की हथेली मे कुछ महेक आज भी है!
    गुज़रता रहा वक़्त जज़्बात ठहेरते रहे!
    ©ruchitashukla

  • ruchitashukla 15w

    "भूख"

    भूख की ना कोई जात पात!
    भूख ना देखे बचपन बुढापा!

    अंतडियो को जलाती भूख बस्ती है झुग्गी मे!
    ना देखे तपती धूप बरसात सावन!

    ना जाने विकास की ये भाषा!
    वो तो जाने सूखी रोटी पर नमक प्याज को!
    बुझाती जो पेट की आग!

    देह की भूख की चाह मे छुपी है!
    धन,ऐश्वर्या और चिर प्रणय की अभिलाषा!

    धन की लालच ने इनसान को बनया हैवान!
    इन्साननियत का कोई मोल नहीं!

    मन की भूख की चाह मे छुपी है!
    मान पदाधिकारी किर्ति और आत्मा गौरव!

    नेताओ मे लगी है आज सता पाने की होड़!
    "वचनेषु किम दर्रिद्रता "कर रहे हैं इस कथन को सार्थक !

    भूल गए सारे वचन भूली शपथ लक्ष्य मात्र सता पाने का!
    देश की जनता महामारी से जूज रही है!
    नेताओ मे लगी है आज सता पाने की होड़!

    आत्मा की भूख चाहे सत्य और चिर उल्लास!
    जहां होता योग दर्शन का आर्विभाव!

    ऐसा अमृत बरसे धरा पर निखरे हर जन!
    बंध अमर प्रीत से हो पुण्य जीवन का उदय!

    करे परमात्मा से कर जोड़ प्रार्थना!
    दे सबको सुबुद्धि सब हो मंगल मय!
    ©ruchitashukla

  • ruchitashukla 15w

    "मृगतृष्णा"

    चमकती हुई रेत पर रात दिन!
    क्षण क्षण अतृप्त सदा भटकता मन!

    कभी मोह से चकित कभी भ्रम से भ्रमित!
    इन्द्रिय तृप्ति के और मन संतुष्टि के प्रयास ने छीना सबकुछ!

    तृष्णा मन की हो या तन की हो!
    कभी ना मिटने वाली कहानी है!

    मिथ्या सारे सपने यहाँ कोई नहीं अपना!
    सब है माया का भटकाव मृगतृषणा मे भटक रहा मन!

    जग सारा एक रंगभूमि!
    हर व्यक्ति है जीवन नाटक का पात्र!

    रिश्ते नाते ना कोई निभाये!
    दौलत का है सब लगाव!

    कर हरि सुमिरन जनम सफल हो जाए!
    सरल राह यही है तज मृगतृषणा!

    @ रूचिता शुक्ला
    ©ruchitashukla

  • ruchitashukla 18w

    इच्छाओं के सागर मे नाव चलती रही!
    सांझ ढलती रही उम्र लहरों पर बिखरती रही!
    ©ruchitashukla

  • ruchitashukla 28w

    लहजे मे शिकायत का अंदाज
    मुहब्बत की निशानी है!
    ©ruchitashukla

  • ruchitashukla 31w

    बला की मस्ती है तुम्हारी अदा ओ मे!
    छाने लगा नशा इन फ़िजा ओ मे!

    ये साँवला बदन मस्त नशीली आँखे!
    जैसे मैकदे खुले हो घटाओ मे!

    जो दि दो लबों की जुम्बिश सागर खनक उठे!
    अंगडाई जो ली बस गयी खुशबू हवाओं मे!

    आँचल जो उड़ा तेरा खिल उठी केसर की वादियां!
    कमर जो तेरी लचकी पड़ गयी जंजीर पाँव मे!

    ज़ुल्फे जो तेरी बिखरी हो गया रात का आलम!
    अब आओं सो चले जुल्फो की छाँव मे!

    सोये तो ना रहे तन-बदन का होश!
    जागे तो हुस्न वस्ल की ठंडी शुआओ मे!
    ©ruchitashukla

  • ruchitashukla 31w

    अनोखा है मेरा और उसका रिश्ता!
    जो बंधा है अनोखे धागे से!
    जो टूटा भी नही और हम आजाद भी नही!
    ©ruchitashukla

  • ruchitashukla 33w

    " मौन"

    मौन का अंदाज निराला मौन का रूतबा है अनूठा!
    वाणी का है व्याप्त व्यापार मौन मे छुपी अनकही बाते!

    आँखें बोलती मौन की भाषा अश्रृरूपी मौन सब करता बयां!
    जब शब्द हार जाते है तब मौन बाजी जीत जाता है!

    मौन का ग्र॔थ तो सिर्फ मन है मौन को महसूस किया जाता है!
    ©ruchitashukla

  • ruchitashukla 34w

    इन्द्रधनुष के रंगो को चुराकर सजाया अपने तन पर!
    कुछ रंग लबों पर सजे कुछ बदन पर सजे!

    चाँद को पिरोया कानों मे आफताब बना माथे का शृंगार!
    सितारों को पहना हाथों मे पैरों मे पहना मोतियों को!
    ©ruchitashukla

  • ruchitashukla 36w

    ����शिक्षक दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं ����
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    गुरु:ब्राह्मा गुरु: विष्णु : गुरुदेवो महेश्वर!
    गुरु: साक्षात परब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नम:!

    गुरु बिना ज्ञान नही!ज्ञान की ज्योति जलाये गुरु!
    ज्ञान का सागर हमारे राहबर है गुरु!

    जब तक न मिले गुरु ना मिटे मन का अंधियारा!
    जब तक रहती गुरु से दूरी ना होती मन की प्यास पूरी!

    हर पीड़ा हरते गुरु जीवन रस को दिव्य करते गुरु!
    हम शब्द तो अक्षर है गुरु अमृत घट का गंगा जल है गुरु!

    ज्ञान सुमन की अनुपम माला तपती धूप मे सर का आंचल!
    जब मिले गुरु से अनुदान अति पावन परिणाम मिले!
    ©ruchitashukla