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  • secondchild 15w

    Khat

    Zehanseeb ,
    Kin inayaton ki aayat me reh guzar hai tera,ya tu sirf meri hi ibaadat hai. Main harfi chaand tak hi pahuncha hun tujhko manzil samjh kr ,
    tu hai bhi ki nahi ya sirf meri wafat main hi teri mulaqaat Tasneef hai!
    Us hisaab se ye haq bhi nahi mujhe ki is chandini ko rehnuma samjhun sirf ek raat k liye bhi .
    Jo Noor tujhme hai wo usme hai bhi ki nahi ..tu hi hai wo ya sirf mere liye hi nahi ...

    Paiagaam kya dun tujhko apni sarfaroshi ka aaj fir mehfil me faramish teri hi hai.
    ek gazal hai purani jo tere hi zikr se bismillah hai par sochta hun ab har nazm me tujhko qaid kar dun.
    Jaane kaun se jazbaat ,shabd banke un sabhi sarhadon se sauda kar lein jo is darmiyaan hai abhi tak.. aur tum bhi ho... .bas mere pass nahi ..ya tum ho hi nahi aur ye mere jazbaat bhi nahi .

    Sab sahi hi dikhta hai jab kuch sahi nahi hota,ab main rota bhi nahi hun kismat pe ,
    ye soch bhi lun ki zindagi k kuch hi to panne the jo waqt ke juyein me haar gya ...
    Par ye kaise bhula dun ki kis kashish se maine har mulaqaat ko likha tha ...zaroor muh tak na aayi ho ..par maine har baat ko likha tha ...
    shayad padh leta kabhi unhi panno ko..
    par padhne ki ab chah hi nahi.. fir dhal jaun ishq me aise halat bhi nahi .
    waqt me dabe wo Alfaaz bhi nahi ...aur shayad is kalam me ab wo baat bhi nahi...
    ©secondchild

  • secondchild 55w

    A Mistaken Identity

    A mistaken identity survived a million eye and fainted for its own good.A famous poetry with impression of delusion still rhetorical in reference. Drowned in many outer perceptions and engulfed with lust and passion to perceive the rhapsody of nature till the last scene of the final play of life .
    The mistaken identity that has layers of drape to protect the very exquisite personality.The crave of acceptance and the fear of responsibilities that stands behind the door.
    This identity is subjected to the entropy that inhale fumes of melody and exudes the lyrics through unintentional body postures that ripples with the tune so to free the bird of emotions from the aviary of insecurities and terrors.

    Its an art to exist with a mistaken identity which is a momentary escape to the garden of imagination where mind is at peace with the surroundings.
    ©secondchild

  • secondchild 55w

    मन का कौतुहल

    कुछ लिखूँ या दिन गिनते रह जाऊँ,
    आज फिर साँस पूछे मुझसे कि-
    "तुझको आऊँ तो क्यों आऊँ?"

    छटपटाहट में सुलगती रेत पर चल रहा हूँ,
    मैं शहर में हूँ,फिर भी हर वक़्त पिघल रहा हूँ।

    कौतुहल भीतर भी है और बाहर भी,
    अगर जीवन ही जीत है तो हर दिन कई हार भी।
    उन हार से ज़िन्दगी न हारे ये भी अलग लड़ाई है,
    तुमको क्या लगा ! सबने सिर्फ कोरोना से जान गवाई है ।

    मंज़ूर तो किसी को नहीं पर तय है-कि ये ज़ख्म सबको सहना है,
    आज खुशियों का मतलब सिर्फ ज़िंदा रहना है।

    तालों में बंद महफ़ूज़ हैं, पर कब तक?


    आज पिंजरों का रुतबा बढ़ गया।
    बंदिशों का भक्षक भी अब उन्ही बंदिशों का अर्थ समझ गया ।
    पर ज़िद्द पर क़ाबू और भी बेताब कर देता है,
    भला चार दीवारों में अपने यौवन को कौन सज़ा देता है।

    कभी कभी होंसला कहता है कि-
    "घुटन को पी कर,कर यक़ीन,
    कि ये आशियाँ तेरा खूबसूरत है,
    जो कभी चुभती थी आंखों में आज
    तुझे उसी रोशनी की ज़रूरत है ।"


    पर ज़िंदगी की तरह ये होंसला भी क्षण भंगुर है।

    कब शोर सिसकियों में दब गया खुद ही यह समझ कर कि कल फिर आंसुओं की ज़रूरत पड़ेगी,
    और कल आंसुओं को रोक दिया किसी ने ये बोलकर कि- " संभाल खुद को,वरना अगली चिता तुम्हारी जलेगी।"

    सब मकड़जाल में फसे हैं, अपनी बारी के इंतज़ार में ,अपनो से पहले बस इसी दरकार में,
    क्यूंकि हमने कभी खुद के लिए जीना सीखा ही नहीं।
    अपनों के बिना दुनिया कैसी होगी,ये सोचा ही नहीं।
    और यही सच है।

    "कुछ कम ही सही ये ज़िन्दगी अब तक लड़ी तो,
    कभी अपने लिए,कभी अपनो के लिए।"

    पर क्या यही अंत है?
    ©secondchild

  • secondchild 85w

    मुर्दे की आत्मकथा

    #secondchild

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    मैं शांत अंधेरों का मुसाफिर हूँ
    लाश हूँ ,अंधेरों में ही औचित्य है मेरा।
    किसी पत्थर की आहट से बाहर आऊँ कब्र से तो सिर्फ सन्नाटे दिखते है,क्या सब लाश है ज़माने में?
    और वो पत्थर किसका है?

    मैं कभी कभी यूँ ही सैर पर निकलता हूँ, जीवों से छुप कर पर होता कोई भी नहीं।
    देखता हूँ हर उस अनहोनी को जिसे शायद कोई और न देख पाता हो। आखिर मैं कर भी क्या सकता हूँ,मुर्दा हूँ , मेरे लिए क्या होनी क्या अनहोनी।
    ढूंढता ज़रूर हूँ उस पत्थरबाज़ को जो मुर्दे जगा रहा ,पर सवेरा मुझे रास नहीं,लालिमा के छिटकने से पहले ही कब्र खींच लेती है मुझको।

    मैंने कभी कोई लाश नहीं देखी ,हाँ और कब्र ज़रूर है चारों तरफ।शायद कोई पहचान ही नहीं हमारी ,सिर्फ रहने को ज़मीन है।
    या फिर ज़मीन ही पहचान है हमारी ।

    हाँ कभी अपनी कब्र पर फूल देख के लगता है की मैं अकेला तो नहीं हूँ। पर उन फूलों का मुरझाना और फिर एक दिन बदल जाना,कभी यूँ ही पड़े रहना कई मौसम ।
    काश थोड़ा एहसास बाकी होता तो मैं समझ पाता इन क्रियाओं को,पर चलो फूल आतें है यही काफी है।


    एक बार खुद पर नज़र पड़ी तो पता चला कि धीरे धीरे ये मांस की पर्त मेरे शरीर के कई अंगों से हटती जा रही और हड्डी का आकार स्पष्ट होता जा रहा।
    अजीब बात है,मैं रोज़ खुद को खो रहा बिना कुछ महसूस किये।क्या ये पहले भी हुआ था ?

    आज ये ख्याल भी आया कि अगर जल जाता तो कहाँ होता।
    होता जहां भी राख होता,
    धूल बनके हवा हो जाता या पानी में घुल जाता कहीं ।
    अब भी क्या अलग है,आखिर में होना धूल ही है।


    जब दृष्टि की जाने की बारी आई तो सोचा कि आज पत्थर का जवाब दे ही दूँ, उस रोशनी को भी चुनौती दूँ जिससे कई ज़माने से रूबरू न हुआ।
    पहले लालिमा आयी फिर धूप पूरे ज़ोर पर थी,
    आज किसी तरह मैने रोशनी पर फतेह पा ही ली।
    पर इतना काफी नही था,अचानक मेरी दृष्टि चली गयी,
    मेरी कब्र फिर मुझे खींचने लगी। कौन खड़ा होता मेरे लिए, मैने पत्थर भी मारे औरों की कब्र पे पर कोई भी न आया ।आखिर सब थे तो मुर्दा ही।अंत में हमेशा के लिए मैं उसी अंधेरें में दफ़्न हो गया।

    पर पत्थर आज भी आतें है।


    ©secondchild

  • secondchild 89w

    ज़िद्दी

    इन लम्हों से जुदा और भी कहाँ सिर्फ तेरी बाहों में ,
    एक गुज़र गयी वो याद बरसात बनके और भी कहाँ , सिर्फ तेरी बाहों में ,
    बेखबर सांसों को आज भी गुमान है तेरी खुशबू का,
    बेपर्दा इश्क़ को आज भी इंतज़ार है तेरी जस्तजू का,
    मैं संभल कर भी तड़प रहा हूँ इन राहों में,ऐसे ही
    एक दिन और बीत गया बिना तेरी बाहों के।

    रुख हवा का आज भी है मेरी ओर,
    सिर्फ मोहब्बत में डूबी कशिश है उनमें ।
    मैं सजदे करता हूँ उन मद्धम झोकों का
    जो इश्क़ से है,पर इश्क़ नहीं ।

    लाल रंग सा गाढ़ा इश्क़ मेरा रक्त है जो ,
    वो तेरा सिंदूर भी हो सकता था।
    ये फितूर मेरी सजनी का कुछ कम भी हो सकता था।

    पर ऐसा ही था मेरा प्यार , जो नसों में बहता था मेरे,
    मैं रहूँ कल में फिर इश्क़ के लिए इस बात का ख्याल था इश्क़ को मेरे ।

    पल में लिपट कर आंधी सा बेकाबू था,
    पर उस पल में लगाम लगा दे इतना कहाँ उसमें जादू था।

    करवटों सा रातों में सिसक रहा था इश्क़,
    हौले ही सही एहसास को अग्नि दे रहा था इश्क़।

    की आज तू समझ ले तेरी औकात पे सवाल है,
    बेमिसाल ना समझ बेइंतहा जज़्बात को
    जिसको नसीब सिर्फ मिट्टी है,
    ये मंज़िल है तेरी काफ़िर ,
    ये वक़्त तुझसे ज़्यादा ज़िद्दी है।
    ©secondchild

  • secondchild 91w

    Purity

    Purity and love are Biological twins
    The intimacy with innocence,the war of lust and affection,the shadow in the corner when the Broken soul weeps and the paranormal nights of delusion where the mirage of our love dominates our sleep .
    We care in our very conscious state and do what love needs and show what it means.
    But is consciousness necessary to portray the best art of affection and love ?
    The algorithm to be the best artist of the non fiction play of relationship guides us in every step to decorate the work of Cupid and give it the best turn that it deserves .
    But is the script too weak to understand the purity of the art which was present in the classical form of its origin.
    Love is a methodical act of representing affection in every possible way where unconsciously we display our best performance on the stage of life.
    There is no need to remember the algorithm or your dialogues but the impromptu portrayal of feelings shows the true essence of what you possess in a very pure state.
    There is a lot to understand on the way ,but the feel of affection should remain pure as long as you stay.
    ©secondchild

  • secondchild 91w

    स्वभाव

    एक स्वभाव से जग- जग विजय,एक स्वभाव से दर- दर पतन।

    कहीं बंदिशें हैं बेड़ियों सी ,कहीं सभ्यता की नींव है ,
    जहां जीवन है दृष्टि में वहीं ज़िंदा भी निर्जीव है
    बेसब्री में ठिठुरता ये मानव भी अजीब है
    एक सत्य में विलीन है ,एक सत्य से गंभीर है।

    एक बाज़ वो जो अशिष्ट है और एक वो जो मापे क्षण में गगन,
    एक साँप कपटी मित्र भी,एक साँप जो घर -घर नमन
    एक भेद है आकार का , एक निश्चयात्मकता विचार की,
    एक कलंक है समाज का,एक परंपरा इतिहास की।

    एक बात वो जो अनकही ,एक बात वो जो क्यों कहें ,
    एक पुस्तक जो अनिवार्य है,और एक वो भी जो हम क्यों पढ़ें!
    एक भय है अंजाम का,एक घमंड का प्रवाह है,
    एक आस्था है धर्म की , एक अज्ञानता की राह है।

    कहीं गर्व सम्पन्न एहसास में ,कहीं गर्व में अपना वतन।
    एक स्वभाव से जग- जग विजय,एक स्वभाव से दर- दर पतन।
    ©secondchild

  • secondchild 96w

    आज

    आज अदृशय सी तबाही हर रोज़ है,
    पर 'हम सही हैं' , इसी में सबकी मौज है,
    सिर्फ सरहदों पर नहीं , आज हर पक्ष की अपनी फ़ौज है।
    खुद की कला पर शंका और अपने आगे एक नेता की खोज है,
    उदारवादी कमज़ोर ही है दोनों पक्षों में,
    और उग्रवादी बुलंद अफ़रोज़ हैं ।

    आज जो भी सोचूं मैं,
    कल की सोच कुछ और ही कहती है।
    किससे पूछूँ कि क्या है सही,
    सच की सियाही भी अब बाजार में बिकती है,
    एक रंग आजमां लूँ, पर एक से सच्चाई कहाँ दिखती है,
    हाँ पर उस सियाही से आज भी मन शांत होता है, जिससे मेरी माँ लिखती है।
    ©secondchild

  • secondchild 99w

    Darr

    Pal pal guzar rha hai..
    Darr ki baatein kar kar ke

    Ki
    Jahan jo Manzar nagawar tha aankhon ko,
    wahan saanson ki sarfaroshi bhi khatak rhi hai
    Aur jo apna hi hai zamaane se,
    uske dar par bhi ab manzil bhatak rhi hai..

    Aaj us ghutan me ghar bas gya jahan
    abru ko jagah aur
    maut ko zroori marz nahi..
    Aur us dhadkan ko bhi karZdaar bna diya jissey dhadkane me kabhi koi harz nahi..
    ©secondchild

  • secondchild 102w

    First Rap

    (chorus)

    Huye phaansle ...
    Khoye jo ye raaste
    Kahan dhundhun wo silsile
    Ki jab hm tmse mile!

    Bekhabar the
    Teri un fitraton se
    Aur
    Ye kya hua mujhe..
    Khudi ko khone lage!!

    (Rap )

    In phaanslo ne raakh kr di yaad teri
    Tha mera pyaar saccha aur jhuthi har baat teri
    Aaj khaankh karun teri unhi baaton ko
    Aaja sunaun toote Dil ke alfaazon ko

    ‌Ghamand kre kataar me khade hai sab jo sad gaye,
    patan karun samaj ka jo apne hi nigal gye,
    Ye bulbule se gulgule jo ek baap ke nahi wo beimaan kaale naag bemisaal ban gaye
    Misaal tu bhi ban gyi jab raaste badal gaye
    Tujhe paccha nahi ki,hui maat par sambhal gye
    ‌Pehchaan thi to uth gya
    naye raaston se jud gya,
    wo raah hi galat thi jisme tjhko paake mud gya!

    kalam me jo awaaz hai wo sun ke fir na lautana,
    na modna wo waqt na jazbaat fir se kholna
    Par bolana wo sab jo maine na kra ho pyaar me ,
    ji han main bhi sunun ki kya kami rhi izhaar me
    ‌Kirdaar me , aaj bhi sunun khuda aae khaas ki ,jo aaj fir rula dun kisi baat pe na chaukna .


    ‌Bhadak gya ..main to inteqaam me
    Behak gya ...aur madhosh hua jaam me

    Rasam,kasam me dhoondhta ajab sitam wo ab nahi ,
    sahi galat bhi kuch kahan
    khushi hasi jhulas gyi,
    Rhi wahi hairaniyan kahaniyan jo thi suni ..
    tha parvaton Sa aashiyan .. dhuan dhuan ab har kahin
    ‌Tu sun abhi khatam karun main rishte jo the beech ke
    Tu rakh sabhi jo kuch banaya khoon mera seench ke
    ‌Libaaz ab na odh chah to mit gyi Zameer se
    Tha tehra tere ishq me aur tu bik gyi raqeeb se

    Ae khuda dikha jahaan in nafraton se aage ka
    Ye ghaanth khol dun abhi na choodun hissa dhaage ka
    Adrishya sa jo har ghadi do aatma ko baandhe tha
    Na daal ab Naseeb me ye ishq aur abhaage ka!

    Abhaage ka
    ©secondchild