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  • sensitive_observer 54w

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  • sensitive_observer 54w

    मंदिर आया था मैं
    बहुत दिनों बाद।
    पहले पाँव के नीचे
    वही पावन ज़मीन थी,
    और दूसरे पाँव के नीचे था
    अगरबत्ती का पैकेट।
    भक्तों के मन अभी भी साफ़ होते हैं,
    अभी भी बच्चे हैं हम भगवान के आगे
    करते हैं शोरगुल और धक्का-मुक्की,
    अभी भी मन्नतें मांगी जाती हैं,
    अभी भी माँ के कहने पर
    आया था मैं,
    हाथ में धागा लिए,
    मन्नत माँगने।

    पंडितजी के इशारे पर
    एक जगह आकर ठिठक गया।
    सौ सवाल,
    अपार आश्चर्य से
    हाथ हलके धागे को छोड़ने लगा।
    इन्हीं हलके धागों के बोझ से
    झुका-झुका और थका-थका था
    लोहे का वो ढाँचा,
    जो कभी मज़बूत लगा करता था।

    मगर आकांक्षाओं के बोझ से
    अब रीढ़ टूटती
    और गर्दन धँसती नज़र आ रही थी।
    शादियाँ, बीमारियाँ, बच्चे, नौकरियाँ,
    न जाने क्या-क्या हो
    धागे से बनी इन फ़ाइलों में।
    इनको देखकर सोचा
    अगर नियति के फ़ैसले में
    धाँधली करने की बात ना होती
    तो न्यायपालिका के पास जाना
    अधिक आशाप्रद था।

    क्षुब्द दृष्टि से मूर्ति की ओर ताका,
    तीनों लोकों के स्वामी,
    सृष्टि के रचयिता,
    सर्वोच्च तथा सनातन,
    वहीं खड़े थे।
    मुझ जैसे आगंतुक को देख
    शायद बहुत दिनों बाद खुलकर हँसे।
    मुझे याद आया एक बार
    खुद को नास्तिक बताकर हँसने पर
    किसी ने कहा था,
    भगवान की इज़्ज़त करो।
    मैंने झट-से धागा जेब में रख लिया।

    वापस लौटते पंडितजी ने पूछा था,
    मन्नत माँग ली?
    तो मैंने कहा था,
    नहीं,
    पर मैं माँ को मना लूँगा।
    ©sensitive_observer

    #hindi #poetry #kavita

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  • sensitive_observer 55w

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  • sensitive_observer 60w

    *नशेड़ी*

    मेरे घर में एक उच्च कोटि का नशेड़ी रहता है जो लॉकडाउन ख़त्म होते ही ठेके की ओर भागेगा। रास्ते में मेल-मिलाप के लिए लोग रोकेंगे मगर उसकी तलब, उसकी बेचैनी उसे सबकुछ नज़रअंदाज़ करने पर मजबूर कर देगी। उसके पैर बेलगाम घोड़े की तरह सिर्फ़ भागते ही जा रहे होंगे। और उसके मुखमंडल पर एक भूखे सिंह के समान वासना छाई होगी।

    कुछ दूर और। बस कुछ दूर और। यही सांत्वना देता वह ठेके के थोड़ा-थोड़ा करीब पहुँच रहा होगा।

    वहाँ पहुँचते ही सामने बैठा दुकानदार मुस्कराते हुए पूछेगा “और बेटे, कैसे रह गया तू इतने दिन?”

    और वह कहेगा, “इस सब का टाइम नही है।”

    इस पर दुकानदार कहेगा, “ठीक है। तो बता, क्या लेगा? पूरा स्टॉक है।”

    यह सुनते ही वह रोमांचित हो बोलेगा, “पूरी लिस्ट है। ऐसा कर तीन चार फिक्शन दे दे। वो दिव्य प्रकाश, जॉन ग्रीन या रविंदर सिंह वगैरह मत देना। वो सब चढ़ती नही है। एक दो नॉन-फिक्शन दे। सुना है मार्क्सवाद में बहुत सारे चूर हो गए। ट्राइ करके देखता हूँ। और चखने में कुछ ग़ज़ल-नज़्म का इंतज़ाम करवा दे।”

    “ये सब नीट लोगे?”

    “चिंता मत कर। घर पर मधुशाला पड़ी है।”

    “वाह! गज़ब के नशेड़ी हो भाई।”

    “हाँ। सोच रहा हूँ लोग इस नशे के बिना जीते कैसे होंगे?”

    ©sensitive_observer

    #addiction #books #reader #story #hindi

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  • sensitive_observer 61w

    *तीन बच्चों का तमाशा*

    गर्मी की छुट्टियों में राहुल, रिया और रिमी माँ के साथ अपने मामा के घर आये हुए थे। उनके मामा सुनील की दो साल पहले ही शादी हुई थी और पिछले साल उन्होंने मामी सहित नाना और नानी को भी शहर बुला लिया था इसीलिए उनकी माँ अब छुट्टियों में उनको लेकर शहर ही आ जाया करती थी।

    मगर बच्चों को इस बात से बड़ी आपत्ति होती। क्योंकि इस मामाघर में उस नानीघर जैसे न बड़े-बड़े मैदान थे न ही आस पास के दोस्त जिनके साथ नए-नए खेल खेले जा सकें। और-तो-और सुनील मामा ने बच्चों को वादा किया था कि इस साल वे टीवी खरीद लेंगे मगर इस बार जब तीनों बच्चे वहां पहुंचे तो मामा ने उन्हें दो साइकिल दिखाई जिनके हैंडलों पर गुलाबी और पीले रंग के झालर लटक रहे थे और पिछले पहियों पर सहायक चक्के लगे थे।

    "अगर तुम दोनों बच्चियाँ इन छुट्टियों में इसे चलाना सीख जाओगी तब ही इन्हें घर ले जाने दूँगा। और हाँ, राहुल को भी इस पर चढ़ने देना। वह अभी छोटा है अगले साल उसके लिए भी ऐसी ही साइकिल ला दूँगा।" मामा ने दोनों साइकिल के एक-एक हैंडल अपने दोनों हाथों में पकड़ कर कहा था।

    इस पर राहुल इतरा कर बोला था, " मामाजी मेरी साइकिल में ये पिंक रिबन मत लगवाना। ये लड़कियों जैसे लगते हैं। येलो वाले भी नहीं।"

    इस पर सुनील ने हँस कर उसे गोद में उठा लिया था।

    तो कुल मिलाकर बात ये हुई कि बच्चों को यह तोहफ़ा पसन्द तो आया था मगर इसकी कुछ त्रुटियाँ थीं। जैसे इन्हें इन गर्मियों के मौसम में सिर्फ शाम के वक़्त ही चलाया जा सकता था। और वो भी नाना जी की निगरानी में ही। यही कारण था कि बच्चों को अक्सर दोपहर में टीवी की कमी खलती थी।

    ऐसी ही एक दोपहर की बात है....

    शब्द सीमा होने के कारण मैं पूरी कहानी यहाँ पोस्ट नही कर सकता। शेष भाग आप मेरे इंस्टाग्राम अकाउंट पर पढ़ सकते हैं।

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    #stories #hindistory #reader #hindi #fiction

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  • sensitive_observer 62w

    और इसी तरह एक अग्नि ने कहीं ऊपर उड़ान भरी और एक अग्नि यहाँ अंदर प्रज्वालित हो गयी। आशा की अग्नि, लक्ष्य की अग्नि, विचारों की अग्नि और इन सब से ऊपर देशभक्ति की अग्नि। कुछ दिनों से देश के हालातों को देखते हुए नकारात्मक ख्याल उमड़ रहे थे। मगर इन से मुक्त कराने के लिए मैं कलाम साहब जैसी पुण्यात्मा को धन्यवाद देता हूँ। आत्मनिर्भरता भारत की प्राथमिकता रही है। कुछ इस पर जुमलेबाजी करते हैं तो कुछ बड़ी कुशलता से अपना काम कर हमारी आँखों में प्रेरणा बनकर चमकते हैं। डॉ कलाम की शख्सियत को उनकी किताब के माध्यम से जानकर बहुत कुछ सीखने को मिला।
    किताबों ने मेरे जीवन में यही तो किया है, हमेशा एक अनिश्चित पर अनोखा मोड़ या दृष्टिकोण दे देना।

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  • sensitive_observer 62w

    चौकीदार ओ चौकीदार
    अगली बार भी तुम आना
    हम सब वादा करते हैं
    इस बार
    हर बार
    आजीवन वोट देंगे तुमको
    अब इन वोटों की भूख को शांत करो
    अब बिलकुल निश्चिन्त रहो
    अब किसी टुच्ची रैली की खातिर
    मासूमों की साँसें दाव पर मत लगाना
    चौकीदार ओ चौकीदार
    अगली बार भी तुम आना।
    ©sensitive_observer

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  • sensitive_observer 63w

    बिक्री

    आजकल तो हर तरफ़ इक ही नज़ारा दिख रहा,
    कि देस हो या भेस हो
    सब बिक रहा
    सब बिक रहा।

    सेठ कहता मैं स्वदेशी मैं ही केवल बेचूँगा,
    देशद्रोही ग्राहक की गंजी
    है फटी सब दिख रहा।

    तेल-साबुन बेचने सिर्फ़ गोरी मैडम आती हैं,
    साँवली बहनें जो रूठीं
    समाज पर कालिख रहा।

    यह तो छोटी बिक्रियाँ हैं, इक बड़ी बिक्री भी है,
    दो अशिक्षित बोतलों पर
    पांच वर्ष है बिक रहा।

    सरकार के सब अस्पताल मौत का ट्रेलर ही हैं,
    राम भी और राज्य भी
    सब सेठ के घर टिक रहा।

    लिख रहा हूँ मैं जो नफ़रत मिट सके तो प्यार हो,
    यूँ लिखने को तो हर कोई
    प्यार ही है लिख रहा।

    आजकल तो हर तरफ़ इक ही नज़ारा दिख रहा,
    कि देस हो या भेस हो
    सब बिक रहा
    सब बिक रहा।

    ©sensitive_observer

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  • sensitive_observer 65w

    Yaar kisi ki phunch hai to pairvi sifarish lga kr mirakee ke posts ki word limit bdhwao... Bhut dua dunga!

  • sensitive_observer 65w

    एक बार एक नेता जी राजनीति के पेंच-पांच और झंझटों से काफी ऊब गये थे। उन्होंने सोचा कि अब उन्हें देश के लिए कुछ करना चाहिए। यह सवाल बार-बार उनके ज़हन में गूँज रहा था कि मुझ जैसा नेता अपने लोगों और अपने समाज के लिए क्या कर सकता है। बहुत विचार करने पर उन्हें इसका हल मिल गया। और उन्होंने पार्टी से इस्तीफ़ा ले लिया। वह अब कर्तव्यनिष्ठा और ईमानदारी से नौकरीपेशा व्यक्ति की ज़िंदगी जीना चाहते थे।

    बस फिर क्या था कार्यकर्ताओं ने हंगामा शुरू कर दिया। विपक्ष ठहाके तो ले रहा था मगर प्रशंसकों की भीड़ नेताजी के घर के आगे जमा हो गयी। इन सब अड़चनों को मद्देनज़र रखते हुए नेताजी ने रात के वक़्त चोरी छिपे ट्रेन पकड़ी और दिल्ली के लिए निकल पड़े।

    उस दिन ट्रेन में....

    शब्द सीमा होने के कारण मैं यहाँ पूरी कहानी पोस्ट करने में असमर्थ हूँ। आप इसे मेरे इंस्टाग्राम अकाउंट (sensitive_observer) पर पढ़ सकते हैं।

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