sharma_raghwesh

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Writer by chance, likh leta hu kuch alfaz.

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  • sharma_raghwesh 59w

    हारा तो मैं तब भी था और अब भी,
    बस फ़र्क इतना ही रहा तब उसे पाके और अब खोके....

    ©sharma_raghwesh

  • sharma_raghwesh 72w

    वो जो फासले है तेरे मेरे दरमियाँ
    माना वो थोड़ी कम तो हुई है,
    ऐसे कई मर्तबा आँखें नम भी हुई है,

    कहने वालों ने भी वो ही ज़ुबानी दी,
    जो मुझे ढूंढते-पढ़ते लेखों में मिली,
    तस्सली तो हो गयी शून्य से दशमलव तक
    इस मर्तबा तू बेवफ़ा नही है आदि से अंत तक...
    ©sharma_raghwesh

  • sharma_raghwesh 75w

    नए किस्म की बेवफ़ाई,एक नायाब तरीका
    पहले दिल चुराई,फिर कचरे में फेंका
    यूँ तोह पहले बातों से बहलाते,फुसलाते थे,
    कभी बाबू, कभी सोना भी आजमाते थे,
    कुछ ऐसा करके भरोसा जीता जाता था,
    फिर कुछ वक्त में ही तोड़ने की आजमाइश होजाती थी

    बात इतनी तक तो रुकी नहीं है आज के समावेश में,
    सुर्खियां बटोर ली है उसने आज के परिवेश में,
    हद्द तो तब हुई दिखावटी प्यार ने नया रूप लिया,
    उस रूप में उसने खुदके ही जिस्म का स्वरूप दिया,
    किसी ने उसकी इज्जत की,पर उसने इसे ही सरेआम किया

    नए किस्म की बेवफाई है यारो,जहां बंधन,प्यार,नैतिकता नही
    चरम पे है झूठ , फरेब
    आज तुम, कल कोई और,क्या फ़र्क़ पड़ता है ,
    कुछ ऐसा ही सीख दिया......ऐसा ही सीख दिया!!
    ©sharma_raghwesh

  • sharma_raghwesh 76w

    उस बेगैरत ने इत्तिला तो किया होता,
    हमने भी खुदके लिए कुछ पल जीया होता,
    काश! वक़्त रहते पर्दा हट जाता उसकी शख्सियत से,
    और मुझे रूबरू कर जाता उसकी असलीयत से,
    गोरी चमड़ी,मन फ़रेबी, काला दिल,
    करने लगी कुछ ऐसी करतूतों से मेरा जीना मुश्किल,

    उस बेगैरत ने इत्तिला तो किया होता.....
    ©sharma_raghwesh

  • sharma_raghwesh 98w

    अर्ज़ियाँ लगाई थी बहुत आज़ादी की,

    और वो आई भी तो क़फ़न ले कर...


    ©sharma_raghwesh

  • sharma_raghwesh 98w

    A time- type of lens figures out the exceptional quality of being hypocritical, deceitful.


    ©sharma_raghwesh

  • sharma_raghwesh 103w

    माना की मैं-तुम 'हम' नहीं,
    फिर भी हम गैर नहीं,
    हाँ! अब वो प्यार नहीं,
    फिर भी 'हम' यार सही,
    ये तय है हमारा ज़िक्र नहीं,
    फिर भी कुछ फ़िक्र सही,
    माना की अब वो इज़हार नहीं,
    पर यारी में वो ऐतबार सही.....!!

    ©sharma_raghwesh

  • sharma_raghwesh 104w

    आँसू हो मगरमच्छ के तो क्या बात है,
    दिखावे को उदास,पर अंतर्मन में हर्षोल्लास है
    जीते जी तो हँसी उड़ाई,पर मरने पे उसके अश्क़ है लाई
    ता उम्र बनके मुख़ालिफ़,अब मरणोपरांत दोस्ती नज़र आई

    खैर, अश्क़ थे भी तो मगरमच्छ के
    वो छुपाते तो कैसे, हर मर्तबा लाते भी तो कैसे...!!
    ©sharma_raghwesh

  • sharma_raghwesh 105w

    छोड़ आया हूँ जज़्बात अपने,
    बोली जो लगाने लगे हैं लोग,

    अब बस जुटा लूँ चंद पैसे
    बन जाऊं मैं भी खरीददार

    सुना है, बाज़ार में प्यार बिकने जो लगा है....!!

    ©शर्मा_राघवेश

  • sharma_raghwesh 105w

    उसके रिफ़ाक़त की चाहत हुई मुझे,
    बाद-ए-मुक़र्रर इक़रार जो हुआ.....
    ©sharma_raghwesh