succhiii

बिखरे बिखरे से अल्फ़ाज़

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  • succhiii 20w

    छंद रचना
    बसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनाएँ 🙏🏻🌸🌸

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    सरस्वती वंदना

    जय हे वीणा वादिनी माँ !
    जय हे किरपा दायिनी माँ ।

    ज्ञान अंजन मल नयन में ..
    ज्ञान भर दे बुद्धि मन में ।
    हर ले तम , तम नाशिनी माँ।
    जय हे वीणा वादिनी माँ ।

    ताल-लय छंदो की रानी ..
    तू तो माँ वेदों की ज्ञानी ।
    स्वर दे , सुर नव रागिनी माँ ।
    जय हे वीणा वादिनी माँ ।

    चेतना -दीपक जलाकर ..
    क्षुद्र मानव का भला कर ।
    शुभ्र छवि हंस वाहिनी माँ ।
    जय हे वीणा वादिनी माँ ।
    @succhiii

  • succhiii 25w

    सय्यार-मुसाफ़िर
    मीटर 1222 1222 1222

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    ग़ज़ल

    न आँसू ही , न तो , ये दर्द थमता है ।
    ऐ मोहब्बत ,ये तुझसे कैसा रिश्ता है ।

    शमाँ भी बुझ गई , जल -जल के सारी शब ..
    धुआँ ही अब धुआँ हर सिम्त उठता है ।

    बहारो ने भी , मुख यूँ मोड़ रक्खा है ….
    महज़ ख़्वाबों में खार-ओ खार दिखता है

    हवायें ,ये फ़जायें , रात , ये जुगनू ….
    सभी चुप हैं , मुसलसल वक्त चलता है ।

    यूँ ही कब -तक रहें सय्यार राहों के …
    न मंज़िल ही , न साया कोई दिखता है ।

    किसे आवाज़ दें , किसको पुकारें अब ..
    गया इक बार जो , कब फिर पलटता है ।

    दुआयें तेरी ,माँ …बस ..साथ है मेरे ..
    वगरना और क्या , जो साथ चलता है ।

    गया ये साल भी ,कानो में कुछ कह कर..
    कलेंडर बदला है ..या , कुछ बदलता है?
    @succhiii

  • succhiii 25w

    तेरी याद बहुत आती है माँ

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    किसे आवाज़ दें …किसको पुकारें अब ..
    गया एक बार जो…कब फिर पलटता है ।

    दुआयें तेरी ,माँ …….बस , साथ है मेरे ..
    वगरना और क्या….जो साथ चलता है ।
    @succhiii

  • succhiii 27w

    ज़बी—माथा
    तिजारत -व्यापार
    काफिरी- नास्तिक , विरोध
    अना -ego
    मीटर - 1222 1222 1222

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    ग़ज़ल

    जलाकर ये दिलो -जाँ रौशनी की है ।
    यूँ ही रौशन नहीं ये ज़िंदगी की है ।

    तिजारत कोई रिश्तो में नहीं रक्खी
    न यूँ ही फ़ायदे की दोस्ती की है ।

    लगाये बारहा इल्ज़ाम , दुनिया ने ..
    मिली हमको सज़ा , सादा-दिली की है ।

    जबी पे ग़म वो रक्खे , जो दिये तूने ..
    कभी हमने , न कोई काफ़िरी की है ।

    समझते “सूचि” की वो बंदगी कैसे ..
    अना से अपने, जिसने दिलबरी की है ।
    @succhiii

  • succhiii 29w

    मीटर - 122 122 122 122
    पैहम -निरंतर
    पैकर -साक्षात
    बहम-साथ
    ख़म - टेढ़ापन

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    ग़ज़ल

    ख़ुशी की ख़ुशी कोई ग़म का न ग़म है ।
    न जाने ये क्यूँ आज फिर ,आँख नम है ।

    जिधर देखिए दश्ते-सहरा ही सहरा …
    कि अहले सफ़र में यहाँ ,ख़म ही ख़म है ।

    ज़माने तिरे चंद ख़ुशियों के सदक़े ….
    किये जीस्त पे हमने ,पैहम सितम है ।

    नहीं जो तू पैकर मेरे रूबरू है ..
    ख़यालों में मेरे सदा ही बहम है ।

    तेरे चाहतों के दयारो में यक्सर ..
    फ़क़त हमने देखें ,भरम ही भरम है ।

    अधूरे से कुछ ख़्वाब , हैं चंद यादें..
    यही हमने जोड़ी थी , बरसो रक़म है ।

    है दिल की फ़क़ीरी , कलम आशिक़ी है ..
    मुझे क्या कमी है , करम ही करम है ।
    @succhiii

  • succhiii 47w

    मुसलसल -निरंतर
    तसलसुल - निरंतर
    ब-दस्तूर -हमेशा की तरह
    212 212 212 212
    @sanjeevshukla_

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    ग़ज़ल - ज़िंदगी

    डूबते तो कभी हम उभरते रहे ।
    रौ में दरिया तेरे यूँ ही बहते रहे

    इस तरह भी बसर जीस्त करते रहे..
    चोट खाते रहे और हँसते रहे ।

    ज़िंदगी की पढ़ाई मुसलसल रही ..
    इंतिहाँ भी ब-दस्तूर चलते रहे ।

    काश और आस के जंगलो में फँसे ..
    जाने कब से तसलसुल भटकते रहे ।

    रूक जा ऐ ज़िंदगी ठैर जा तू ज़रा ..
    आबले पा के, कब-तक यूँ सिलते रहे?

    जी तो लेने दे उन लम्हों को भी कभी ..
    राह- ए-दिल से सदा जो गुज़रते रहे ।

    रात यूँ याद आई किसी ख़्वाब की …
    गुफ़्तगू चाँद तारो से करते रहे ।

    ख़ैर है ! रौशनाई रही हाथ में …
    शुक्र हम तो , खुदा तेरा करते रहे ।

    “सूचि” माने भी तो हार कैसे कोई …
    ख़्वाब पलको में कल के जो पलते रहे ।
    @succhiii

  • succhiii 48w

    आज ज़रा कुछ हट के लिखा है …उमीद है पसंद आएगी और आप लोग झेल पाइएगा 😊😊
    Duet ग़ज़ल है ये ❤️
    122 122 122 122
    @sanjeevshukla_
    _ @rekhta_ @hindiwriters @hindinama

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    ग़ज़ल - मौसम

    ये बारिश का मौसम गुलाबी -गुलाबी
    समा है नशीला , शराबी -शराबी ।

    निगाहें भी तेरी ,सवाली - सवाली …
    तो चेहरा मिरा भी ,किताबी- किताबी ।

    अदा हाय ! ये शोख़ियाँ तेरी जानाँ ..
    दिलो में करें हैं , ख़राबी -ख़राबी ।

    हैं मदहोश सी , ये हवाएँ -फ़जाएँ ..
    अजब सी है छाई , ख़ुमारी -ख़ुमारी ।

    सिमटने लगी हैं ये ख़ामोशियाँ भी
    तेरा इश्क़ तो है , जवाबी -जवाबी ।

    झुका लो तुम अपनी नशीली निगाहें..
    ये दिल हो न जाए , शराबी -शराबी ।

    फ़साना तो ये इश्क़ -ओ-हुस्न का है
    ये दुनिया बहुत है , सवाली- सवाली ।
    @succhiii

  • succhiii 49w

    @sanjeevshukla_ @rekhta_ @hindiwriters @hindinama @parle_g

    1222 1222 122

    कौन आएगा यहाँ कोई न आया होगा
    मेरा दरवाज़ा हवाओं ने हिलाया होगा
    - कैफ़ भोपाली

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    ग़ज़ल

    गुमां होता है हर -पल मुझको कोई
    सदा देता है पल-पल तुझको कोई ।

    रखे हैं तेरे ख़त सम्भाल अब -तक ..
    कि आहट हो कोई , दस्तक हो कोई ..

    शबे- फुरकत कभी ,ख़त्म हो मौला ..
    सहर की भी दिखे सूरत तो कोई ।

    महक उठती दरो-दीवार घर की ..
    सबा लाती तेरी ख़ुशबू जो कोई ।

    तेरा ग़म है, तू है ,तो रौशनी है …
    वगरना जीस्त बेमक़सद हो कोई ।
    @succhiii

  • succhiii 51w

    ग़ज़ल इंतिहा

    यही है इंतिहा तो इब्तिदा क्या है
    तुम्हीं बतलाओ अब ये माजरा क्या है ।

    दिलो में जब नहीं है क़ोई भी दूरी ……
    तो बतलाओ मियाँ , ये फ़ासला क्या है ।

    अना के शाख़ पे कलियाँ मोहब्बत की ..
    यूँ ही गर सूख जाए , सोचना क्या है ।

    बहुत नख़रे हैं ज़ालिम ज़िंदगी तेरे ..
    दुआ भी काम ना आई , दवा क्या है ।

    लहू अश्को का दरिया बन के निकला है ..
    बता मेरे खुदा तेरी रज़ा क्या है ।

    @succhiiI

  • succhiii 51w

    मीटर 122 122 122.

    दर्द बढ़ कर फ़ुग़ाँ न हो जाए
    ये जमी आसमाँ न हो जाए

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    ग़ज़ल

    यूँ रस्ता भी देखे न कोई
    कि टूटे यूँ , बिखरे न कोई ।

    बहे जाये आँखों से काजल ..
    रुलाए यूँ …….रूठे न कोई ।

    बिछड़ जा ! बिछड़ना अगर है ..
    यूँ मुड़ -मुड़ के देखे न कोई ।

    जो है आज में है , अभी है ..
    सो कल की ख़बर ले न कोई।

    है अब संग यादो का बस्ता ..
    सहारा ये छीने न कोई ।


    ©succhiii