suryamprachands

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  • suryamprachands 11w

    ♥️��

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    नित नए सब स्वप्न बुनकर, गर्त में जाता रहा मैं
    क्या कुटुंबी और क्या धन, सभी कुछ खाता रहा मैं
    निज हृदय विध्वंस कर, अपभ्रंश का भागी हुआ मैं
    गत-अनागत काल चक्रण में फँसा, दागी हुआ मैं
    मैं हूँ बैठा, ज्ञान,दर्शन,चेतना, सब नष्ट करके
    कौन अपना औ पराया, यही सब स्पष्ट करके

    मैं नियति के द्वार, याचक बन, खड़ा कब तक रहूँगा?
    मृत्यु धारण कर चुका हूँ, कहाँ किस किससे कहूँगा?
    कौन होगा,जो सुनेगा, मन से मेरे दग्ध मन को,
    या करेगा, स्नेह से स्पर्श, मेरे रुग्ण तन को?
    कौन समझेगा, ये मेरे हास्य का, वो करुण क्रंदन?
    कौन होगा जो करेगा, शीश मेरे मुक्ति मंडन?

    वेद जितनी वेदना, धर कर, हृदय बस चल रहा है
    कल्प भर से,.कल्पना का विष पिया अविचल रहा है
    चक्षुओं में अश्रु बैठे, नित नई कुंठा सजाए
    कौन हो जो, उन को छूने से, तनिक भी ना लजाए?
    प्रार्थना कोई सुने बस, व्यथोदधि उद्दाम ना हो
    जय पराजय सब है स्वीकृत,बस हृदय संग्राम ना हो

    बस हृदय संग्राम ना हो.........

    ©SURYAM MISHRA

  • suryamprachands 11w

    मीटर- 1222 1222 1222 122

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    ग़ज़ल

    गया बेकार फ़िर, ये आँख का ज़मज़म हमारा
    हुआ गुमनाम फ़िर वो कल्ब करके नम हमारा

    फकत हर बार अपने ही किसी ने,. दर्द बख्शा
    कभी गर दर्द हो पाया ज़रा भी,... कम हमारा

    तवक्को थी हमें भी कि,...रहेंगे बन के हमदम
    बड़े ही दम से हमदम ने,. निकाला दम हमारा

    मलाज़ो में ज़रा भी ठौर, मिल पाया ना हमको
    खुदा घर यार सोचें,.क्या ही हो मक़्दम हमारा

    मुआलिज,इस खुदा ने ,खूब ढ़ाया कहर मुझपे
    किया फ़िर से यहाँ बर्बाद, सब दमखम हमारा

    बिना गज़लों के यूँ तो बात हो सकती नही थी
    पड़ा चुप-चाप है,... बेजान हो "सूर्यम" हमारा

    ©SURYAM MISHRA

  • suryamprachands 15w

    जय शिव....����

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    शिवस्तुति

    नमामीश शंभुं,......त्रिकालं नमामिं
    महाकाल कालं,......कृपालं नमामिं

    महेश्वर सुरेश्वर........श्री संतापहारी
    प्रभो चंद्रशेखर.........भुजंगेशधारी
    जटाजूट शंभो त्रयं.........ताप हारी
    दिगंबर दिशाधिप,.....प्रणम्यं पुरारी

    ललाटाक्ष मोहक कृपानिधि जटाधर
    परमवीरभद्रं......कपर्दी......धराधर
    महादेव भूसुर,..मृत्युंजय अचर-चर
    स्वयं शून्यनंतं,....स्वयंभू क्षर-अक्षर

    नमो चारुविक्रम,..जगद्व्याप्त शंकर
    सुखं सृष्टि मूलं,......सुपर्याप्त शंकर
    अनघरूप साशक्त,....अव्यक्त शंकर
    सदा शक्ति,..शाश्वत समनुरक्त शंकर

    गिरीशं नमो,........चंद्र भालं नमामिं
    महाकाल कालं,.......कृपालं नमामिं

    ©सूर्यम मिश्र

  • suryamprachands 17w

    Have a read please.....

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    Who we are?

    We the most,
    unimpeachable perpetrators
    Are nothing but,
    the mallets of the cosmos.
    We are just,
    the rebellion flags against creators
    We are the doom,
    the zero silence to the infinite plose.

    We are the
    vengeance of juncture,
    not the prayer
    of some hollow opportunities
    Twigs of dejection,
    orized of Dead dried clusture
    We are hurled,
    From the clumsy sacred unities

    Believe me, we are
    randomly scattered on to and fro
    We are there to make
    world lustrous just like a star.
    The solitary problem,
    is that we don't know how to grow
    and How do we know ourselves
    since this universe know, who we are.


    ©- Suryam Mishra

  • suryamprachands 21w



    दिनकर से बाँधे,.......चोक्ष बंध
    भइ भोर भरी,.....ले मलय गंध
    हल्दी सम प्रणयी,.. क्षुदित खेत
    पुहुपों की कलिका,...रति समेत
    ऋजुरोहित सी आच्छादित महि
    लवलीन लता बहती,. बन अहि
    फागुन की,....शीतल मंद पवन
    मुस्काता पाकर,... प्रिय उपवन
    अमबौरों का,.......उन्मुक्त हास
    शाखों पर श्री,.... कर रही वास
    कवियों की वय का,... एक वर्ष
    आ गया लिए वह,.... प्रचुर हर्ष

    कर में समग्र जग,रम्य रूप भर लाए हैं
    स्वागत कीजै ऋतुराज द्वार पर आए हैं

    ©सूर्यम मिश्र

  • suryamprachands 22w

    भाग- 3

    तब रावण ने मुस्का कर के
    अधरों पर अधर टिका कर के

    एक बात कही जो अमृत थी
    पर करने वाली विस्मृत थी

    आचार्य बनूँ, स्वीकार मुझे,
    पर आया एक विचार मुझे

    इस मन में थोड़ा विस्मय है,
    क्या पुण्य कार्य लंका जय है?

    तब मौन हुए कुछ जाम्बवान,
    बोले लंकापति स्वयं ज्ञान

    है ऐसी कोई बात नहीं
    जो लंकेश्वर को ज्ञात नहीं

    श्री राम युद्ध को उद्यत हैं
    ये बात तुम्हें सब अवगत है

    जो प्रश्न तुम्हारा विस्मय है
    हाँ पुण्य कार्य लंका जय है

    तब रावण थोड़ा मुस्काया
    आसन से उठ नीचे आया

    बोला वो राम तैयार रहें
    और मन में एक विचार रहे

    बस यज्ञ वहाँ हो, द्वंद ना हो
    सत्कार्य हो बस, छल छंद ना हो

    यजमान गेह पर यदि ना हो
    अवसर हवनादि यज्ञ का हो

    सब संग्रह है आचार्य कार्य
    सामग्री सब है अपरिहार्य

    मैं साथ सिया को लाऊँगा
    शिव संस्थापन करवाऊँगा

    ©सूर्यम मिश्र

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    दोनों भागों में "रामावतारम" के अंश मात्र की प्रस्तुति के उपरांत प्रस्तुत है तीसरा और अंतिम भाग।

    आशा है आप समस्त को पसंद आएगा,

  • suryamprachands 22w

    भाग-2

    वह बोले तब फ़िर शंका में,
    एक व्यक्ति है ऐसा लंका में

    है व्यक्ति किंतु लंकेश वही,
    है ऐसा एक विशेष वही

    ब्राह्मण कुल का,है वैष्णव है,
    शिव भक्त परम है,अभिनव है

    पर क्यों वह यज्ञ कराएगा?,
    निज ही निज मृत्यु बुलाएगा?

    श्री राम शांत थे,बोल उठे,
    अद्भुत प्रसून से डोल उठे

    राक्षस है रावण,धर्मी भी,
    है इतना नहीं अधर्मी भी,

    निश्चय ही वह आ जाएगा,
    आकर वह यज्ञ कराएगा

    शत्रू पर भी विश्वास करो,
    हे जाम्बवान प्रयास करो

    तुम दूत मेरे बन कर जाओ,
    संदेशा मेरा कह आओ

    वह आकर यज्ञ करा जावें,
    यजमान प्रफुल्लित कर जावें

    मुझ पर इतना उपकार करें,
    आचार्य नमन स्वीकार करें

    फ़िर जाम्बवान लंका आए,
    प्रभु का संदेशा ले आए

    रावण को जब यह ज्ञात हुआ,
    तब तिमिर हृदय में प्रात हुआ

    भट हाथ जोड़ कर आते थे,
    रीछेन्द्र को राह बताते थे

    जब सभा मध्य वह हुए खड़े,
    काँपे भट जो थे बड़े-बड़े

    तब उठी सभा सब आसन से,
    लंकेश उठा सिंहासन से

    अभिनंदन वह अभिराम किया,*
    कर जोड़ नमन प्रणाम किया

    बोला अभिनंदन वरण करें,
    हे बाबा आसन ग्रहण करें

    तब जामवंत जी मुस्काए,
    कुछ कहना था ना कह पाए

    बोले इतना सुयोग्य नहीं,
    मैं अभिनंदन के योग्य नहीं

    मैं अंशज तिमिर विनाशी का,
    मैं दूत राम वनवासी का

    यह सुनकर रावण मुस्काया,
    उसके मन जाने क्या आया

    बोला बाबा के मित्र आप,
    दिखती है उनकी अमिट छाप

    कैसे ऐसा अपवाद किया?,
    क्या कार्य, मुझे है याद किया?

    तब रीछराज मन हर्ष बहा,
    उठ कर अपना सत्कार्य कहा

    अधरों पर धर रामेश नाम,
    रघुवर करते हर पुण्य काम

    अर्हत लिंग स्थापनोपरांत
    सत्कार्य सफल हो दिग दिगांत

    पूरा हो पूरा अनुष्ठान,
    यज्ञादि कर्म सब विधि विधान

    इसलिए यहाँ मैं आया हूँ
    आचार्य निमंत्रण लाया हूँ

    ©सूर्यम मिश्र

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    !! रामावतारम !!
    आप सबने पिछले भाग पर जो मनमोहक टिप्पणियाँ की, वो काफ़ी उत्साहवर्धक थीं, प्रस्तुत है अगला भाग

    ©Suryam Mishra

  • suryamprachands 22w

    रचनाप्रति के 145वें संस्करण में अपनी अद्भुत रचनाएँ प्रेषित करने के लिए आप समस्त का सादर आभार



    रचनाप्रति के अगले संस्करण के संचालन का भार मैं @anandbarun सर के हाथों में प्रेषित करता हूँ।

  • suryamprachands 22w

    #rachanaprati145
    भाग-1

    लंका पर विजय कामना से
    रावण-वध प्रबल भावना से

    श्री राम उदधि के कूलों पर
    थे सत्य साधना मूलों पर

    तब मन में एक विचार हुआ
    यूँ भक्ति भाव विस्तार हुआ

    निकला हूँ विजय साधने जब
    शिव संस्थापित हो जाएँ तब

    यह सोच राम विदुजन सम्मुख
    हो गए लिए विचार परमुख

    यह मत विद्वानों को भाया
    सबका मन इससे हर्षाया

    बोले प्रभु है यह कार्य उचित
    हो शीघ्र कार्य अब यह समुचित

    शिव सफल करेंगे मत निश्चय
    प्रमुदित हो बोले सब जय जय

    शिवलिंग स्थापित करवाएँ
    आकर उसमें शिव बस जाएँ

    धारें प्रभु अब वेदादि मर्म
    संपन्न करें यज्ञादि कर्म

    सत कोटि सुमंगल दायक है
    यह कार्य हृदय हर्षायक है

    आचार्य धार कर श्रीमान
    पूरा कर दें यह अनुष्ठान

    आचार्य सुशोभित हो वैसा,
    जो वैष्णव हो,हो शिव जैसा

    जो कर्म कांड का ज्ञाता हो,
    वैदिक,प्रकांड आध्याता हो

    सबने सबका मस्तक देखा,
    खिंच उठी रंज की इक रेखा

    आचार्य कहाँ से लाएँ अब,
    गुण जिसमें भर जाएँ ये सब

    फ़िर एक सन्नाटा सा छाया,
    श्री जामवंत मन कुछ आया



    ©सूर्यम मिश्र

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    !! रामावतारम !!
    अनुशीर्षक में प्रस्तुत काव्य कहानी, महर्षि कम्ब की रामायण "रामावतारम" की उस कहानी से प्रेरित है, जब रावण ने श्री राम के संकल्प को पूरा करने के लिए आचार्य बनकर, श्री राम की कार्यसिद्धि के लिए यज्ञ करवाया था,... त्रुटियों से अवगत अवश्य कीजिएगा,....

    ©सूर्यम मिश्र

  • suryamprachands 23w

    रचनाप्रति

    सर्वप्रथम बहुत धन्यवाद देना चाहूँगा @loveneetm भैया को कि उन्होनें मेरी रचना को इतना मान दिया और विजेता चुना।

    मैं रचनाप्रति के अगले संस्करण के लिए जिस विषय को चुनना चाहता हूँ वो है कि आप किसी भी कहानी को काव्य रूप में प्रस्तुत करें।

    कोई भी एक कहानी जो आपके मन में हो आपको अत्यंत प्रिय हो उस कहानी का काव्य रूप प्रस्तुत करने के लिए आप सादर आमंत्रित हैं।

    परिणाम की घोषणा मैं 29/01/2022 को दोपहर तक करूँगा,.......