vaish_02

Rivers never go Reverse ~

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  • vaish_02 25w

    तुमसे दूर भी
    रंज ओ गम बतलाने को मजबूर भी
    मेरी आँखे सूखी सूखी
    मेरी आँखों को पिलाने आ,..

    खेल सारा छुपन छुपाई का
    प्याला जिस्म से भरा
    प्याला खत्म होते ही
    अपनी रूह को मिलाने ला,..

    झूठ ये हैं के 'सच रूठा हैं तुम से'
    सच कहूं तो 'सच मुस्कुरा रहा हैं'
    साँसे करवटें बदल रही है
    रात बाकी हैं अभी, तु मुझे सुलाने तो आ,..

    ©Vaishnavi ♥️

  • vaish_02 27w

    माँ बाप को परखा नहीं
    समझा जाता हैं,..

    ©Vaishnavi ♥️

  • vaish_02 27w

    समय कितना भी बीत जाये
    कुछ एहसास भुलाए नहीं जाते ,..

    ©Vaishnavi ♥️

  • vaish_02 28w

    तुम आओ न आओ
    तुम्हारी महक जरूर आती हैं
    जैसे की तुम मेरे पास आेर पास आ रहे हो
    वह महक मेरे भीतर तक फहल जाती हैं
    सर्द रातों में सुनी खिड़की पे कोहरे का छाना
    वैसे होता हैं तुम्हारा आना
    तुम धुंदले जरूर लगते हो
    मगर शामिल हो मेरी महफ़िल में
    तुम्हारे आने न आने से
    ये सच नहीं बदलता
    के ये सारे गीत तुम्हारे नाम हैं
    ,..तुम आओ न आओ
    तुम्हारी महक जरूर आती हैं
    और खुदखुशी कर लेते हैं मेरी बाग़ के सारे गुलाब
    फिर मैं अपने केशो में लगा लेती हूँ
    तुम्हारे साथ बिताए वह सारे लम्हात
    आह !! तुम्हारी महक मेरी साँसों में घुलने लग जाती हैं
    ,..तुम आओ न आओ
    तुम्हारी महक जरूर आती हैं
    कभी मुझे आया करती थी
    अब मुझ से ही आती हैं
    ,..तुम आओ न आओ
    तुम्हारी महक जरूर आती हैं ,...

    ©Vaishnavi ♥️

  • vaish_02 29w

    इक बहुँत कुछ हैं,
    जो चल रहा हैं अंदर
    इक सब कुछ हैं,
    जो थमा सा लगता हैं
    और तो क्या कहूँ ?
    इक मैं हूँ, इक तुम हो
    क्या इतना काफी नहीं !

    ©Vaishnavi ♥️

  • vaish_02 31w

    अब मान लिया मुश्किल को आसान
    एक मेरे गुमसुम होने पें दुनिया रुकती नहीं
    तुम जाओ, तुम रूठ जाओ
    मुझे अपना सा लगता हैं ये मिज़ाज़
    शुरू में रात आयी थी या दिन कौन जाने ?
    एक आना जरूरी सा था
    यूँ अपनी पलकों पे मोती पिरोया न करो
    मैं तुम्हारी पलकें चूम लूँगी
    मेल न ये मेरी कविता खाती हैं, न अपने हालात
    मगर मुझे नहीं लगता,
    यादों के क़ाफिये को किनारा करने में हर्ज हैं कोई |

    ©Vaishnavi ♥️

  • vaish_02 31w

    गजब हैं सनम की बातों का सिलसिला
    सिलसिला गजब है अकेली रातों का सिलसिला
    कुछ मीठी यादों का
    कुछ रूठे जज़्बातों का सिलसिला
    ये सिलसिला दूरियों का फिरभी करीब सा
    ये किसी पुरानी आदत सा सिलसिला
    ये सिलसिला यूहीं चलता रहे
    तेरी मेरी उल्फत का सिलसिला
    इस अधुरी हयात में पूरी इबादत का सिलसिला
    ये सिलसिला यूहीं चलता रहे
    जब जब मैं मिलूं खुदसे तू मुझे मिलता रहे
    ये सिलसिला यूहीं चलता रहे
    मेरी साँसों में तेरी साँसों का कारवां घुलता रहे
    ये सिलसिला यूहीं चलता रहे
    जिंदगी के बाद भी कुछ चले या न चले
    तेरी मेरी चाहत का
    ये सिलसिला यूहीं चलता रहे !

    ©Vaishnavi ♥️

  • vaish_02 32w

    ज़िन्दगी क्या हैं ?
    एक वक्त हैं जो जन्म से लेकर शुरू
    और मौत तक ख़त्म हो जाता हैं
    ये वक्त हैं , ये ज़िन्दगी हैं
    ये शुरू हैं , ये ख़त्म हैं
    तुम और मैं इस दायरे के मोहताज नहीं
    हमारी मुलाकात इससे परे हैं
    चलो अबकी बार माफ़ कर दिया तुम्हे
    अगली बार घडी को घर पे ही छोड़ आना
    ये वक्त ये ज़िन्दगी कलाई से उतार के
    अपनी कलाई को मेरी अंगुलियों के बीच थमाना
    तुम्हारा हाथ अपने हाथों में पकड़ कर
    मेैं ले चलूंगी तुम्हे वहाँ
    वहाँ उस लाल पहाड़ की चोटी पर
    वह पहाड़ कोई साधारण नहीं
    बोहोत आये और बोहोत गए
    पर आज तक कोई नहीं पहुँच पाया वहाँ
    तुम्हे पता है क्यों ?
    क्योंकी वे सारे लोग घडी को अपने साथ ले आया करते थे
    पर मुझे विश्वास हैं हम जरूर पहुँच पायेंगे वहाँ
    हमने तो घडी को पहले ही उतार दिया
    वक्त को उतार दिया , ज़िन्दगी को उतार दिया
    अरे नीचे क्या देख रहे हो ?
    जो उतार दिया वह निचे उतार दिया
    तुम ऊपर देखो न !
    सब कुछ लाल लाल नजर आ रहा हैं
    ये कोई स्वप्न तो नहीं
    हम पहुँच गये लाल पहाड़ी की चोटी पर
    जीते जी ज़िन्दगी से भी ऊपर
    ये कोई स्वप्न नहीं ये सच्चा एहसास हैं
    ये एहसास हैं , ये खास हैं
    ये शुरू नहीं , ये ख़त्म नहीं
    ज़िन्दगी के बाद क्या हैं ?
    जो ज़िन्दगी से पहले था वही
    एक तुम भी यही एक मैं भी यही
    लाल पहाड़ी की चोटी नजरों में नहीं
    अंदर दिल में बसी हैं कही |

    ©Vaishnavi ♥️

  • vaish_02 34w

    वो रिश्ता ही सब को रास आता हैं
    जिसमें एक घटता हैं, तो एक जलता हैं
    ये तेल और रूई का नाता भी
    कुछ अपना सा लगता हैं
    खैर! रोशनी चारों ओर फह़ल रही हैं
    दुआये भी पहुँच जाएगी |

    ©Vaishnavi ♥️

  • vaish_02 36w

    3. त्रिवेणी

    विशाखा

    ऐसा लगता हैं, गंगा मैया को मेरी आँखे अतीव प्रिय हैं | जो वह बार बार उन्हें अपने दर्शन कराती हैं | अब मैंने अपना नया दुपट्टा रूपा को दिखाने के लिये ही बैग से निकाला था और हसी मजाक में उसने वो हवा में लहराया | तेज हवा चल गयी, और क्या ? दुपट्टा उन छिछोरे लड़कों के सामने जा गिर पड़ा | तो क्या में अपना नया दुपट्टा भूल जाऊ ? अब इस में मेरा क्या कसूर था भला,.आजकल के लोग भी बड़े पागल दिखते हैं,.बेक़सूर पे ही हसते हैं | फिर क्यों न मेरी आँखों से गंगा जमुना बहे ?

    संतोष

    उस पल सूरज अपना सारा तेज किसी ओर को सौपा कर खुद विराम लेने जा रहा था | आसमान में शाम की रंगबेरंगी छ़टाये फहल रही थी | उफ्फ्फ ! हटाओ उन्हें आज मुझे वो भी फीकी लगती हैं | मेरी नजरो के सामने ये स्वर्ग की प्रतिछाया किसने ला कर रखदी हैं ? मैं हैरान हूँ ! तब ही किसीने मेरे हाथों में गरम चाय रखदी और मुझे एहसास हुआ मैं किसी स्वर्ग में नहीं हालांकि चाय की दुकान पे हूँ | और मेरी नजरो के सामने कोई प्रतिछाया नहीं , एक पागल लड़की हैं | मेरी बात तो इसे सुनाई नहीं देती | अरे पागल इशारा तो समझ जाओ ,...

    विशाखा

    हाये राम ! आग लग जाये उस दुपट्टे को, अब मैं क्या इतनी पागल लगती हूँ ? जो कोई मुझे इशारा कर के बताये | न जाने क्या समझते हैं कुछ लोग खुद को ? अगर इतने ही सज्जन हैं, तो रख दे मेरी आँखों के सामने मेरा जामुनि दुपट्टा | यूँ तो आँखों में काजल ड़ालने सारी अंगुलिया बेक़रार रहती हैं पर वही काजल अगर आँखों के अंदर चल दिया , तो मजाल हैं मुँह की जो फूक मारने आँखों के सामने खड़ा हो जाये | हूँ,........

    संतोष

    अरे ! अब तो हाथ में दुपट्टा आ गया और ये हाथ से निकल गयी | वैसे आज मुझे ऐसा लगता हैं, आइने का रंग जामुनी ही होता होगा,...


    ©Vaishnavi ♥️