vikaspoorve

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  • vikaspoorve 56w

    इंसानी फितरत

    वो ताउम्र दूसरों पर उँगली उठाता रहा
    खुद के सारे कर्म सदा ही भुलाता रहा
    वो माँगता रहा ईश्वर से दुआएँ खुशियों की
    पर औरों की खुशियों में दिल को जलाता रहा

    वो चाहता रहा कि यूँ ही किस्मत बदल जाए
    मगर खुद को बदलने से हमेशा बचाता रहा
    वो गढ़ता रहा झूठी कहानियाँ जुल्मों की
    और दूसरों को झूठा वो अक्सर बताता रहा

    ये तय था कि एक दिन पोल खुल ही जानी है
    मगर फिर भी वो पर्दों में सच हो छिपाता रहा
    हर एक से सिर्फ मतलब से बात करने वाला
    दूसरों को हर वक्त वो मतलबी बताता रहा

    ये भी न सोचा कि सब हिसाब इधर ही होना है
    वो फिर भी तकलीफों का कर्जा चढ़ाता रहा
    एक आवरण चढ़ा लिया उसने खुद के चेहरे पर
    और फिर सबको झूठे किस्से वो सुनाता रहा

    इंसान भी कितना अजीब है जो अक्सर
    अपनी पीड़ा का कारण दूसरों को बताता है
    अपने कर्मों को देखे बिना किस्मत को कोसता है
    और अक्सर कई गुना दर्द जिंदगी में उठाता है

    - विकास पुरोहित "पूरवे"
    ©vikaspoorve

  • vikaspoorve 120w

    हरपल हरदम खुश ही रहो तुम उदासियों हो जाएँ अब गुम
    आज का पावन सा है ये दिन बिता रहा हूँ खुशियों के बिन
    पास हो मेरे, नहीं तुम्हारे पास बचा है समय जरा सा
    इसीलिए मन मेरा है किया खत लिख दूं एक प्यार भरा सा
    पैदा होते ही दादी ने तुमको जब मुझको सम्भलाया
    रूई से कोमल थे तब तुम, देख कर मेरा दिल भर आया
    कठोरता से भरे हुए इन हाथों से तुम्हे लग ना जाये
    धीरे धीरे यही तो एक दिन अनायास ही लत बन जाए
    घुटनों चलने लगे थे जब तुम हर पल पीछे मेरे आते थे
    जहाँ चला जाता था मैं फिर, तुम भी वहीं चले आते थे
    साथ तुम्हारा चाहता था मैं, चाहता हूँ मैं तो ये अब भी
    बस में मेरे नहीं है अब कुछ बदल गया है अब तो वक्त भी
    पढ़ने लिखने में गये तुम दिल-ओ-जान से हो मशगूल
    मम्मी पापा भी चाहते हैं यही, दादा को तुम गये हो भूल
    पास ना आना बात ना करना, जी लेते हो अब तो मुझ बिन
    कमरे में आये हुए भी हो जाते हैं दस दस दिन
    आस में बैठा रहता हूँ मैं, तुम आओगे बात करोगे
    कुछ पल के ही लिए सही बस तुम तो मेरे साथ रहोगे
    पिछले साल तक जो बादामों का चूरा मुझसे खाते थे
    हर दिन उसको खाने के लिए ही सामने तुम मेरे आते थे
    पिछले कई दिनों से उसको खाना तो दूर, बनाता नहीं
    क्यूंकि बिना तुम्हारे मुझसे अब वो खाया जाता नहीं
    बात ज़रा सी है ये इतनी लेकिन तुमको पता नहीं है
    मेरी बूढी आँखों में झाँकने के हेतु जो वक्त नहीं है
    मम्मी पापा दोनों तुम्हारे देर शाम तक करते नौकरी
    याद तुम्हे कर पायें कैसे, समय जो उनके पास है नहीं
    लेकिन मैं तो दिन भर घर में बैठ के क़दमों को सुनता हूँ
    तुमसे ही बातें करने के नए नए सपने बुनता हूँ
    बेटा इतनी सी है तमन्ना, दूर मेरा तुम एक गम कर दो
    टीवी इंटरनेट के वक्त में थोड़ा वक्त तुम तो कम कर दो
    उस थोड़े से वक्त के लिए, पास मेरे तुम तो आ जाना
    दोस्त के जैसे बात करेंगे, भूल जायेंगे सारा जमाना
    अंत में खत का करता हूँ अब, प्यार सहित तुम्हारा दादा
    पूरी कर दो छोटी सी ख्वाहिश, याद करो ये भूला नाता

    ©vikaspoorve

  • vikaspoorve 136w

    अभिमान अक्सर बुद्धिमान व्यक्ति
    को भी वाँछित सफलता पाने से रोक देता है।
    विनम्रता ही खुशियों का रास्ता है।

    ©vikaspoorve

  • vikaspoorve 136w

    धर्म सड़कों पर लहू बन कर बहता रहेगा
    इंसानियत की बातें करने वाला करता रहेगा

    ये खून का बदला खून से लेकर रहेंगे
    कोई बेगुनाह मरेगा अगर तो मरता रहेगा

    हर चीज़ को ये अपने ही चश्मे से देखते हैं
    इनको देखकर आईना भी अक्सर डरता रहेगा

    सियासत को पसंद आता है ये लाल रंग बहुत
    जब जब चुनाव आयेंगे ये यूँ ही बहता रहेगा

    जब तक अपनी आँखों पर पर्दा कर के चलेगा
    इंसान इनकी चालों में हर बार पड़ता रहेगा

    ©vikaspoorve

  • vikaspoorve 156w

    वो बदल देती है चेहरे हर एक के हिसाब से
    ढल जाती है हर एक के रंग में शादी के बाद
    उसका लड़कपन कब एक
    संजीदा नारीपन में खोने लगता है
    उसे खुद पता नहीं चलता

    हर एक की खुशियों की फ़िक्र में
    भूलने लगती है खुद की रुचियाँ
    सोचती है कहीं कोई गलती न कर बैठे
    चाहती है कि सबको खुश रख सके
    डरती है कही मायके की कोई
    कमी न रख दे कोई उसके आगे
    इसी चाह में बन जाती है वो
    जो वो नहीं होती

    चाहती है खुद की खातिर
    वो बस एक ऐसा शख्स
    जो समझ सके उसकी अनकही बातें
    पढ़ सके जो उसका चेहरा
    जो रख सके ख्याल उसकी ख्वाहिशों का
    और बस उस एक चेहरे की खातिर
    लुटा देती है अपना सर्वस्व अस्तित्व

    ©vikaspoorve

  • vikaspoorve 156w

    सुनो!
    वो कहानी जो खत्म हो चुकी है न
    उसे गुनगुनाने का अलग ही मज़ा है

    हाँ ये सच है कि कोई शिकवा नहीं जिंदगी से
    और खुशियाँ भी बहुत हैं मगर
    वो जिस मोड़ पर जिंदगी ने करवट ली थी न
    उस मोड़ पर लौट आने का अलग ही मज़ा है

    किसने कहा कि वो तस्वीर अधूरी रह गई
    वो उतनी ही थी जितनी होनी थी
    उसकी खूबसूरती ज़रा भी कम नहीं
    अक्सर अपनी यादों की एल्बम से निकाल कर
    उस तस्वीर को होठों से लगाने का अलग ही मज़ा है

    न अफसोस है और न ही दिलासा
    मगर खुद का जो हिस्सा छूट गया है तुममें
    और तुम्हारा जो हिस्सा आ गया है मेरे पास
    उन दोनों को भूले भटके ही सही मगर
    एक दूसरे की याद दिलाने का अलग ही मज़ा है

    वो कहानी जो खत्म हो चुकी है
    उसे गुनगुनाने का अलग ही मज़ा है

    ©vikaspoorve

  • vikaspoorve 165w

    हर किसी की कोई ना कोई मजबूरी है
    रिश्ते महफूज़ रखने को ये सोच जरुरी है

    ©vikaspoorve

  • vikaspoorve 165w

    मोहब्बत में लिखने को अफसाने बहुत हैं
    जहां में हमारे भी सबसे याराने बहुत हैं
    लिखने बैठूं तो ताउम्र कलम हमसफर हो
    मेरे यार ने यादों के दिये नज़राने बहुत हैं

    ©vikaspoorve

  • vikaspoorve 167w

    मैं ताउम्र रोज़े में रह जाऊँ मेरे यार
    जो ईद बन कर मिलने का वादा तुम करो

    ©vikaspoorve

  • vikaspoorve 167w

    ऊंच नीच और ज्ञान की बातें
    बाँट देती है लोगों को
    सबको जोड़े रखने को अब
    बेहतर है मैं प्यार लिखूं

    कहाँ का नेता, कहाँ का चमचा
    मिले वोट बस वहीँ पे थम जा
    लड़ जा, भिड़ जा, कट जा, पिट जा
    नेताओं के खातिर मिट जा
    मेरा नेता, तेरा नेता
    कौन है बाप और कौन है बेटा
    इन सब बातों में पड़ कर अब
    काहे मैं तकरार लिखूं
    बेहतर है मैं प्यार लिखूं

    मरे जो कोई मर जाने दो
    लुटे जो कोई लुट जाने दो
    सब चालू है, सब फ़र्ज़ी हैं
    इन सबकी खुद की मर्ज़ी है
    हमने तो कब से साहबों को
    डाल रखी कितनी अर्ज़ी है
    भूख, गरीबी नहीं है कुछ भी
    और ना भ्रष्टाचार लिखूं
    बेहतर है मैं प्यार लिखूं

    वो देखो वो मुन्नी, शीला
    किसका कितना दिल है ढीला
    नाचो गाओ कुछ ना सोचो
    नेताओं का सर ना नोचो
    कांड करे सो कांडा भाई
    घास चरे सो लल्लू
    ये सब तो हैं बड़े लोग
    बस हम ही एक निठल्लू
    न्याय के मंदिर में निर्धन की
    अब तो सदा ही हार लिखूं
    बेहतर है मैं प्यार लिखूं

    वो है कमतर, वो है बेहतर
    क्या मिलता है ये सब कह कर
    नेतागीरी का लगा है मेला
    सबके साथ है सबका चेला
    देश बेच कर खा लेंगे पर
    हमको नहीं मिलेगा धेला
    लड़ कर भी जब मिले ना कुछ भी
    क्यों मैं हाहाकार लिखूं
    बेहतर है मैं प्यार लिखूं

    ©vikaspoorve