vishal__

१३/०१/२०२० ०६/०५ ��

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  • vishal__ 2d

    ग़ज़ल

    किसी को साझा करने का मन नहीं करता,
    अपना किसी को कहने का मन नहीं करता,

    दगाबाज तो मैं खुद हैं अब उम्मीद किस की,
    किसी से उम्मीद करने का मन नहीं करता!

    अच्छा है मशगूल है खुद में अच्छा लगता है,
    अब किसी से बात कहने का मन नहीं करता!

    सोचता हूँ निकल जाऊँ दूर यहाँ से मैं भी,
    यहाँ से दूर निकलने का मन नहीं करता!

    देखता हूँ सब को खामोश ही रहता हूँ अंदर से,
    किसी से पहचान करने का मन नहीं करता!

    अब यहीं हूँ आते जाते सब को देख लिया करता हूँ,
    देखकर किसी को मिलने का मन नहीं करता!

    ©vishal__

  • vishal__ 4d

    खामोश रहूँ, कुछ न कहूँ,
    कुछ ना बोलूँ और कुछ न सुनूँ!
    अच्छा है!

    दर्द सहुँ, पर न चलूँ,
    गर रुक भी जाओ तो न बहुँ!
    अच्छा है!

    नज़र देखूंँ, निग़ाह चुराऊँ,
    उतर के दिल में फिर भी न रहूँ!
    अच्छा है!

    काफ़िर हूँ, काफ़िर रहूँ,
    बदनाम होकर जाऊँ, होकर न जिऊँ!
    अच्छा है!

    नासमझ हूँ, नासमझ रहूँ,
    खफा है तू, कभी मैं भी खफा हो न जाऊँ!
    अच्छा है!

    जिंदा हूँ, तलाश में रहूँ,
    ज़िन्दगी हूँ, इंतजार मौत का न करूँ!
    अच्छा है!

    दूर हूँ, जज़्बात हूँ,
    एहसास हूँ, फिर भी खास न रहूँ!
    अच्छा है!

    कोई नहीं हूँ, फ़र्क हूँ,
    जिक्र हूँ, पर कभी कब्र न रहूँ
    अच्छा है!

    ©vishal__

  • vishal__ 5d

    ग़ज़ल

    ज़िंदा हूँ मैं यह परेशानी उसे चुभती रहती है
    मौत मिलती नहीं मुझे बात कहती रहती है

    ना'काम का रह गया हूँ निग़ाह में अब उसके
    जैसे मेरे हर दर्द को बस वहीं सहती रहती है

    गुनाहों का घड़ा शायद अभी बाक़ी है दोस्त
    मेरी मौत के लिए पल पल वो मरती रहती है

    मालूम है बा'द मेरे उसका हश्र होगा क्या यहाँ
    सख़्त रहती सामने पर दिल में ड़रती रहती है

    छोड़ भी नहीं देती मुझे न सोहबत रहती है वो
    कुछ इस तरह मुहब्बत मुझसे करती रहती है

    ठुकरा देती है हर बात को जो हलक से हो मेरे
    आधी कही बात में भी बात वो भरती रहती है

    बस यह इक वज़ह है जो ज़िंदा रखे है यहाँ पे
    ज़िंदा हूँ मैं यह परेशानी उसे चुभती रहती है

    ©vishal__

  • vishal__ 5d

    ग़ज़ल

    बद'तमीज़ रहे हर पल तो यहाँ ईमाँ दिखेगा कैसे?
    छतों को झाँक कर बताओ आसमाँ दिखेगा कैसे?

    हम तो लूटाते रहे अँधे बन के हर इशरत को यहाँ
    इल्ज़ाम लगाकर दूरियों में वो अमाँ दिखेगा कैसे?

    पलकों ने झुकना क़ुबूला था तो वहीं कर गए हम
    मसरूफ़ थे ख़ुदी में तो मेरा अरमाँ दिखेगा कैसे?

    तबस्सुम के ख़ातिर तेरे पत्थर दिल बन कर गए
    सच्ची थी उल्फ़त तो बताना गुमाँ दिखेगा कैसे?

    मऱज बन कर ख़ुदी मेरा जख़्म कुरेदते गए तुम
    ना-समझ कैसी के पास रह दरमाँ दिखेगा कैसे?

    अभी ज़रूरत के वक़्त याद आता हूँ दिमाग़ से
    दिल ने किया था कभी अब पैमाँ दिखेगा कैसे?

    तशरीफ़ रख देते इर्दगिर्द क्यों की इश्क़ किया है
    वऱना भीड़भाड़ में मुफ़लिस मेहमाँ दिखेगा कैसे?

    ©vishal__

  • vishal__ 72w

    ग़ज़ल

    १२२२ १२२२ १२२२

    रहूँ सादा यहीं चाहत उसी की थी,
    सही में बात वो भी तो खुशी की थी

    मिलूँ तो जिन्दगी सा साथ रख देती
    पुरानी बात ना जाने कभी की थी

    रही यादें जिसे भूला सकेंगे क्या?
    दिले नादाँ हले मुश्किल अभी की थी

    ©vishal__

  • vishal__ 75w

    कुछ खास नहीं लिख पाया हूँ! बस कुछ गिले-शिकवे है जो मन में उन्हें उतार रहा हूँ

    #abhivyakti07

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    ग़ज़ल

    "सैनिक!"

    "सरहद-ए-इश्क़! "

    सरहद-ए-इश्क़ में जाँ-निसार कर देते है,
    बूत ख़ुद बनके खोल ख़ूँ-ए-ज़िगर देते है,
    हिमामत ख़ुद-ब-ख़ुद की ख़ुद पर रहती,
    पर्दा कर अपनों को हद-ए-नज़र देते है,
    बे-मौसमी, बे-आलम, बे-इंतहा इश्क़ से,
    वो काँटों में भी खिला के गुल-शज़र देते,
    महज़बी अपने करम-ओ-धरम से वाँ पर,
    महफ़ूज के लिए कर जाँ-परवर देते है,
    जब भी लौट आते लिपट कर तिरंगा वो,
    बुझे चराग़ो में आग़ वो जलाकर देते है,
    रहमतों से सलामत मुल्क ब-दौलत रहा,
    याद आएँ बस सादा-ए-पर्चा पे उतर देते है,
    काश रखते हौसला जिन्दा कभी दिल में,
    शहादत भी गौर करती हरेक की याँ दिल में,
    जो सरहद-ए-इश्क़ में जाँ निसार कर देते है!

    ©vishal__

  • vishal__ 75w

    ग़ज़ल

    "आत्मनिर्भर!"

    बढ़ाएँगे कदम से कदम हम उस और चलेंगे
    बे-ईमान, बद'तमीज़ का बदलके छोर चलेंगे

    करेंगे आबाद हुनर से अपने अपनों का बाग़
    बाग़-ए-उल्फ़त खिला के दिखाते ज़ोर चलेंगे

    सिखेंगे-सिखाएँगे पीछे छुटे हार नहीं मानेंगे
    आस्माँ क़ाबिज़ के लिए ऐसी ले डोर चलेंगे

    गुज़रे जमाने से लाए्ँगे वो डुबती कश्तीयाँ
    ब-दौलत उनके सत्ह-ए-बहर कर पार चलेंगे

    उम्मीद-ए-बू तलाशेंगे हर सम्त पर संग उनके
    आत्मनिर्भर करते सब को संग जोड़ चलेंगे

    परवाज को कर बुलंद हौसलों से सर-ए-आम
    हम लिखी वो बद'किस्मती को मरोड़ चलेंगे!

    ©vishal__

  • vishal__ 75w

    ग़ज़ल

    बोझ लिए बैठा हूँ काश उतारने आ जाता
    डगमगते कदम को तू संभालने आ जाता
    मुड़ कर देखता ग़र कभी हालातें क्या हुई
    दिल से राज़ वो सारे तू समझने आ जाता
    उम्मीद हार कर भी हारा नहीं था दोस्त मैं
    शायद अनसूनी रही बातें कहने आ जाता
    मशगुल इतना भी नहीं था के भूल गया हूँ
    बिते दिनों की याद सही लिखने आ जाता
    कितना संभाला..शायद दर्द है जो चुभता
    उज्र कर कुछ तुम..उसे कुरेदने आ जाता
    तह-ए-मदफ़न में शोर बहुत रहा रूह का
    सर-ए-मदफ़न पर उसको सुनने आ जाता
    अब ना-काम रहती ग़ज़ल और अश'आर
    ताबूत में लिपटा काश वो पढ़ने आ जाता

    ©vishal__

  • vishal__ 75w

    गुल-ए-दान - flower pot, उम्दगी- greatness पा- पाव,
    दिल-ए-जाँ - brave heart, ख़्वाजगी - ownership, बेगानगी - estrangement, नग़्मगी - lyricisim

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    ग़ज़ल

    २१२ २१२ २१२ २१२

    ख़ुद ख़ुदा आए तो, ज़िन्दगी माँगता,
    साथ उस के मिरी, बंदगी माँगता,

    चाहतों में सजाकर, गुल-ए-दान सा,
    जिस्म-ओ-रूह में, सादगी माँगता,

    पा चले और उसके, सर-ए-आम तो,
    दिल-ए-जाँ में ख़ुदा, उम्दगी माँगता,

    काबिलों में बना, नाम अपना कभी,
    इश्क़ में उस, मिरी ख़्वाजगी माँगता,

    क्या पता है मिरे, दिल-ए-नादाँ तुझे,
    वक़्त के साथ, ख़ुद बेगानगी माँगता,

    या लिखे लफ़्ज में, जिन्दगी से मिरी,
    दर्द से गुज़रती, नग़्मगी माँगता,

    ©vishal__

  • vishal__ 75w

    ग़ज़ल

    किस बात का गुस्सा है जो उभर कर आता है
    जानता नहीं हूँ क्यों मिरे रह-ए-सफ़र आता है

    उसकी मौज़ूदगी तो मिरे इर्द-गिर्द समाई रहती
    दूरियाँ का किनारा वो फ़िर क्यों नज़र आता है

    चाहत रखता हूँ जिसे भूल जाने की अर्से से मैं
    सामने मिरे ही वहीं क्यों रह-ए-गुज़र आता है

    अब तो शौक़ से चढ़ाए गए गुल कब्र पर मिरे
    सुना है हम-दम बीच में उनका शहर आता है

    जिसे महफ़ूज रखने को कट गए सर-ए-आम
    हरा-भरा वो भी सफ़र में ही शज़र आता है

    काश मुड़कर आती जाँ विशाल कभी तेरी भी
    ज़िन्दा जिस्म से निकल सारा ज़हर आता है

    ©vishal__